राग रागिनी वर्गीकरण को विस्तार से समझाएं || Explain Raga-Ragini classification in detail || CLASSICAL MUSIC ||

जुलाई 09, 2021 Sangeet Waale 1 Comments


 
राग - रागिनी वर्गीकरण :-

मध्यकालीन की यह विशेषता थी की कुछ रागों को स्त्री और कुछ रागो को पुरुष मानकर रागों की वंश -परम्परा मानी गई। इसी विचारधरा के आधार पर राग-रागिनी पध्दति का जन्म हुआ। 
यही भारतीय सृस्टि तत्त्व का दर्शन है। इसी दृष्टि से सांगीतिक सृस्टि के विकास एवं उत्पत्ति के लिए भी स्त्री पुरुष रूप राग - रागिनी सिद्धान्त का व्यवहार संगीत में पाया जाता है। इसी सिद्धान्त का का प्रभाव राग - रागिनी वर्गीकरण पद्धति के ग्रंथों में दिखाई देता है। इस वर्गीकरण में रागों को पति - पत्नी तथा पुत्र - पुत्रवधू  आदि मानकर इसी आधार पर रागों का वर्गीकरण किया गया है। मध्यकालीन क्रियकुशल गुणियों में सूरदास व अन्य अष्टछाप के कवी स्वामी , हरिदास एवं तानसेन आदि राग -रागिनी वर्गीकरण को ही मानने वाले थे। 
स्वरसाम्य के साथ स्वरोच्चारण की समानता तथा चलन समता जैसे कुछ सिद्धान्तों को आधार बनाकर इस वर्गीकरण में संशोधन किया गया , परन्तु प्राचीन परम्परा का सुदृढ़ सहयोग न मिल पाने से यह व्यवस्था गुणियों में मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी। 

राग -रागिनी वर्गीकरण की उत्तपत्ति व मान्यताएँ :-
अर्थात शिव तथा शक्ति के संयोग से रागों की उत्पत्ति हुई। महादेव के पाँच मुखों से पाँच राग और छठा राग पार्वती के मुख से उत्पन्न हुआ , जो इस प्रकार है 
महादेव के पाँच से क्रमशः राग उत्पन्न हुए 

पूरब मुख  -   भैरव राग 
      पश्चिम मुख -   हिण्डोल राग 
उत्तर मुख -    मेघ राग 
     दसक्षिण मुख - दीपक राग 
आकाशोन्मुख -श्री राग 

तथा पार्वती जी के मुख से कौशिक राग उत्पन्न हुआ। राग - रागिनी वर्गीकरण उत्तर भारत व दक्षिण भारत दोनों जगह प्रचलित था। 
संगीत मकरंद में पुरुष राग , स्त्री राग एवं नपुंसक राग आदि का विभाजन मिलता है तथा इनका संबंध -रौद्र ,वीर ,अद्भुत ,शृंगार ,हास्य , करुण ,भयानक ,वीभत्स और शांत रसों से जोड़ा गया है। इस ग्रन्थ में ताल को विष्णु रूप नाद को शिवरूप एवं गीतों को प्रणव ब्रम्हा रूप बताया गया है। 
संगीत दर्पण राग -रागिनी वर्गीकरण का प्रसिद्ध ग्रन्थ स्वीकार किया जाता है। 
इसमें शिव तथा शक्ति के संयोग से रागों की उत्तपति निम्न प्रकार बताई है 

अद्योवक्त्र मुख से - श्री राग 
वामदेव मुख - बसंत राग 
अघोर मुख से - भैरव राग 
तत्पुरुष मुख से - पंचम 
ईशान मुख से - मेघ राग की उत्त्पत्ति हुई है। 

लास्य नृत्य के प्रसंग से पार्वती के मुख से नटटनारायण राग अवतरित हुआ है।  

राग - रागिनी वर्गीकरण के चार मत
 
राग - रागिनी पद्धति को मानने वालों के मुख्य रूप से चार मत है :- 
शिवमत ,कल्लिनाथ  मत , हनुमनमत तथा भरत मत। शिवमत को मानने वालों के लिए दामोदर कृत संगीत दर्पण नामक ग्रन्थ महत्वपूर्ण है। शिवमत और कल्लिनाथ मत दोनों में 6 - 6 रागों में 36 - 36 रागिनियाँ बनती हैं,परन्तु रागों के नाम एक होने के बावजूद भी दोनों के रागिनियों में काफी भेद है। 
पंडित लोचन के ग्रन्थ रागतरंगिणी में हनुमनमत के अनुसार राग - रागिनियों के नाम व ध्यान मिलते हैं। ये संगीत दर्पण के राग ध्यानो व नामो के समान है। 
(1) शिवमत - संगीत दर्पण के अनुसार 6 रागों की 36 रागिनियों को स्वीकार किया गया है ।प्रत्येक की 6 - 6 रागिनियाँ होती हैं। उन 6 रागों और 36 रागिनियों का विवरण नीचे दिया गया है। 
 

( 1 ) श्री- मालश्री , त्रिवेणी , गौरी , केदारी , मधुमाधवी , पहाड़िका ।

( 2 ) बसन्त- देशी , देवगिरी , वराटी , टोड़िका , ललिता , हिंदोली ।

( 3 ) भैरव- भैरवी , गुजरी , रामकिरी , गुणकिरी , बंगाली , सैंधवी ।

( 4 ) पंचम- विभाषा , भूपाली , कर्णाटी , नड़हंसिका , पालवी , पटमंजरी ।

( 5 ) वृहन्नाट- कामोदी , कल्याणी , अमरी , नाटिका , सारंगी , नट्टहम्बीरा ।

( 6 ) मेघ- मल्लारी , सोरठी , सावेरी , कोशिकी , गंधारी , हरश्रृंगार ।

(2) हनुमान - इस मत के अनुसार 6 राग और प्रत्येक राग की 5 - 5 रागिनियाँ होती हैं। इस मत के 6                                     रागों और 30 रागिनियों के नाम निम्नांकित तालिका में दिए जाते हैं। 

( 1 ) भैरव- मध्यामादि , भैरवी , बंगाली , बराटिका , सैंधवी ।

( 2 ) कौशिक- तोड़ी , खम्बावती , गोरी , गुणक्री , ककुभ ।

( 3 ) हिंदोल- बेलावली , रामकिरी , देशाटया , पख्मंजरी , ललिता ।

( 4 ) दीपक- केदारी , कानड़ा , देशी , कामोदी , नाटिका ।

( 5 ) श्री- बासन्ती , मालवी , मालश्री , धनासिक , आसावरी ।

( 6 ) मेघ- मल्लारी , देशकारी , भूपाली , गुर्जरी , टंका ।


(3) कल्लिनाथमत -  की 6 राग और 36 रागिनियाँ इस प्रकार हैं। 

( 1 ) श्री- गौरी , कोलाहल , धवल , वरोराजी , मालकोश , देवगंधार ।

( 2 ) बसन्त- अधाली , गुणकली , पटमंजरी , गौड़गिरी , धांकी , देवसाग ।

( 3 ) भैरव- भैरवी , गुर्जरी , बिलावली , बिहाग , कर्नाट , कानड़ा ।

( 4 ) पंचम- त्रिवेणी , हस्ततरेतहा , अहीरी , कोकम , बेरारी , आसावरी ।

( 5 ) नटनारायण- तिबन्की , त्रिलंगी , पूर्वी , गांधारी , रामा , सिंधु

( 6 ) मेघ- बंगाली , मधुरा , कामोद , धनाश्री , देवतीर्थी , दिवाली ।

(4) भरत की 6 राग और 36 रागिनियाँ इस प्रकार हैं। 

( 1 ) भैरव- मधुमाधवी , ललिता , बरोरी , भैरवी , बहुली ।

( 2 ) मालकोश- गुर्जरी , विद्यावती , तोड़ी , खम्बावती , ककुभ ।

( 3 ) हिंडोल- रामकली , मालवी , आसावरी , देवरी , केकी ।

 4 ) दीपक- केदारी , गौरी , रुद्रावती , कामोद , गुर्जरी ।

( 5 ) श्री- सैंधवी , काफी , ठुमरी , विचित्रा , सोहनी ।

( 6 ) मेघ- मल्लारी , सारंग , देशी , रतिवल्लभा , कानरा । 

इस प्रकार राग - रागिनियों की वंशावली चल पड़ी। उपरोक्त चारों मतों में श्री , भैरव तथा हिंडोल इन तीनों रागों को मुख्य 6 रागों में तो सम्मिलित किया गया , किन्तु आगे चलकर , किन्ही भी दो वर्गीकरणों  में समता नहीं रही है। आज यह बताना बड़ा ही कठिन है कि राग - रागिनी पद्धति में स्वरसाम्य , स्वरूप - साम्य अथवा दोनों का ध्यान रखा गया था , क्योंकि मध्यकालीन राग - रागिनियाँ आधुनिक रागों से भिन्न थी। 



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