संगीत ही जीवन है || sangeet hi jeevan hai || sahitya sangeet kala vihin shlok in hindi || CLASSICAL MUSIC ||

जुलाई 30, 2021 Sangeet Waale 0 Comments

 

संगीत और जीवन 

  साहित्य संगीत कला विहीनः ,

  साक्षात पशुः पुच्छ विषाण हिनः। 

 जीवन का तात्पर्य मानव जीवन से है ,पशु - पक्षी जीवन से नहीं और संगीत से तात्पर्य केवल शास्रीय - संगीत ही नहीं , बल्कि भाव - संगीत ,चित्रपट संगीत ,लोक संगीत आदि से भी है।  भारतीय जीवन के पग - पग में संगीत व्याप्त है। जन्म से मृत्यु तक यह हमारे साथ बना रहता है। जिस क्षण बालक इस संसार से प्रथम परिचय प्राप्त करता है तो वह संगीत द्वारा ( रोने के रूप में ) अपना आभार प्रकट करता है और जिस समय मनुष्य इस संसार से विदा लेता है तो संगीत के द्वारा राम - नाम की महिमा बताई जाती है। इतना ही नहीं , मानव के इतिहास में जब भाषा का जन्म तक नहीं हुआ था ,उस समय आपस में भावों का आदान - प्रदान संगीत द्वारा ही सम्भव था। मैक्समूलर ने ठीक ही कहा है कि संगीत का जन्म भाषा से कही पूर्व हुआ है। यहाँ पर संगीत का व्यापक अर्थ लिया गया है। 

भारतीय जीवन में 16 संस्कार माने गये हैं , जैसे नामकरण ,कर्णछेदन ,मुण्डन ,विद्यारम्भ ,यगोपवीत (जनेऊ) ,विवाह आदि। इनमे से प्रत्येक का प्रारम्भ और अंत संगीत से होता है। ऐसा भी कोई त्योहार नहीं है ,जहाँ संगीत न हो ,बल्कि संगीत के बिना त्योहार अधूरा रह जाता है। छोटा - बड़ा कोई भी उत्सव मनाया जाता उसमें संगीत आवश्यक है ,चाहे संगीत प्रार्थना तक ही क्यों न सिमित हो। दिन भर के कठोर परिश्रम के बाद सांयकाल वंशी की की एक छोटी सी धुन शरीर का सारा श्रम हर लेती है। गावों में फसल तैयार होती है तो उनका हर्षोल्लास होली के  रूप में  प्रकट होता है। वे जिस ख़ुशी और आत्मीयता से गले मिलते ,रंग छिड़कते और अबीर - बुक्का लगाते हैं की देखते ही बनता है। किन्तु उनके हर्ष की चरम सिमा उस समय पहुँचती है जब वे गाँव के कोने - कोने में ढोलक लेकर अपनी - अपनी धुन में मस्त रहते हैं। मनों पुरे वर्ष की सारी थकावट निकाल कर रख रहे हों। 

संगीत केवल विनोद की वास्तु नहीं ,बल्कि ऐसा चिरस्थाई आनन्द है जिसमें हमें आत्मसुख मिलता है। इसीलिये संगीत भक्ति का अभिन्न अंग रहा है। जितने भी अच्छे भक्त हुये हैं,सभी संगीत के ज्ञाता और साधक थे।  भारत का कौन ऐसा व्यक्ति होगा जिसने सूर, तुलसी, मीरा, आदि का नाम नहीं सुना हो। उनके प्रत्येक पद में ऐसा भाव है कि मनुष्य आनंद - विभोर हो जाता है। भारत के प्रथम राष्टीपति स्व० डा० राजेंदर प्रसाद के शब्दों में हमारे साधु संतों की संगीत -साधना का ही यह प्रभाव था कि कबीर ,सूर ,तुलसी ,मीरा ,तुकाराम , नरसी मेहता ऐसा कृतियाँ कर गये जो हमारे और संसार के साहित्य में सर्वदा ही अपना विशिष्ट स्थान रक्खेगी। 

संगीत मनुषय का तनाव कम करता है औऱ मानसिक रोगो के उपचार में भी सहायता करता है । संगीत में दीपक राग से दीपो को जलना, मेघमल्हार राग से बादलो का बरसाना औऱ मोहन राग को सुनकर सापो का लहराना, यही सिद्ध करता है की हमारे जीवन के लिए संगीत संजीवनी है । आप लोग भी अपनी दिनचर्या में से थोड़ा सा वक़्त निकाले औऱ संगीत को अपने जीवन का हिस्सा बनाए औऱ देखे की आप अपने अंदर कितना फर्क महसूस करते है । 

वैदिक युग की संस्कृति में भगवान विष्णु दशाअवतार नारायण के रूपों की व्याख्या करते हुये मानवीय संस्कृति को बचाने का प्रयास समरसता का भाव सनातन धर्म की स्थापना पर अपने बौद्धक विचार मानव सेवा नारायण का उद्‌बोधन दिया। उनके दशावतार पृथ्वी के उद्धार के लिए मंगल मैं कल्याण के लिए बरहा अवतार मत्स्य अवतार कच्छ अवतार नरसिंह अवतार वामन अवतार परशुराम राम कृष्ण और बुध अवतार लेकर मानव जीवन सृष्टि का उद्धार किया यह हमारी भारतीय संस्कृति वेद पुराण उपनिषद बताते हैं। 

संगीत सभी को प्रसन्नता देता है। संगीत की कोई भाषा नहीं है, कोई जाति, धर्म, वर्ग तथा संप्रदाय नहीं है। संगीत की कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं है। संगीत तो स्वच्छंद रूप से अविरल धारा के रूप में बहता हुआ सृष्टि के कण-कण में गूंजता रहता है। संगीत मनुष्य को भावनात्मक, संवेदनात्मक तथा संवेगात्मक रूप से जोड़ने का कार्य करता है। यह व्यक्ति के दुखों-कष्टों को कम कर उसके तनाव तथा परेशानियों को दूर करता है। संगीत मनुष्य के सुख-दुख, उल्लास तथा सभी अवसरों का साथी है। इसलिए यह आवश्यक है कि बाल्य अवस्था में प्रारंभिक शिक्षा से ही संगीत तथा योग को पढ़ाकर तथा सिखाकर इसे स्वाभाविक जीवन शैली के रूप में स्वीकार किया जाए। यह संयोग ही है कि 21 जून को ही विश्व संगीत दिवस तथा विश्व योग दिवस मनाया जाता है। योग एवं संगीत वास्तव में जीवन की अमूल्य निधियां हैं। वर्तमान भौतिकवादी जीवन में सभी को योग एवं संगीत की आवश्यकता, महत्त्व तथा मूल्य का बोध हो रहा है। ईश्वर के द्वारा प्रदत इन दोनों जीवन अमूल्य निधियों का लाभ लेकर तन तथा मन को बाह्य एवं आंतरिक रूप से स्वस्थ एवं सुंदर बनाया जा सकता है। सभी निरोगी हों, सभी कष्टों से मुक्त हों, सभी स्वस्थ रहें, सभी का जीवन सुंदर तथा आनंदमयी हो, यही भारतीय दर्शन, योग एवं संगीत की अवधारणा है।

मनुष्य के दुखों, कष्टों तथा परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा ने इस अनुपम कला की उत्पत्ति की। मानवीय कल्याण के लिए ईश्वर द्वारा प्रदत यह कला संगीत की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती, नारद, किन्नरों, गंधर्वों, ऋषियों, मुनियों, योगियों तथा अप्सराओं के माध्यम से मनुष्य के लिए धरती पर पहुंची। आदिदेव भगवान शंकर को नटराज कहा जाता है। चारों वेदों में सामवेद संगीत से भरा हुआ है। नाट्यशास्त्र को पंचमवेद की संज्ञा दी गई है। भगवान कृष्ण, जो 64 कलाओं में पारंगत थे, को सर्वप्रथम बांसुरी वादक माना जाता है। हमारी पौराणिक कथाओं में सभी देवी-देवताओं को वीणा वादन में सिद्धहस्त माना जाता रहा। देवलोकों में संगीत के प्रसंग आज भी सुनने को मिलते हैं। रावण एक संगीत मर्मज्ञ तथा कुशल वीणा वादक था। भगवान शिव, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, नारद, मां सरस्वती, किन्नरों, गंधर्व अप्सराओं, ऋषि-मुनियों, पीर-पैगंबरों, योगियों, तपस्वियों तथा साधु-संतों का यह संगीत आज मानव के लिए वरदान बन चुका है। संगीत आत्मा का भोजन है तथा संगीत के बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। यह पूर्ण जीवन संगीतमय है। जीवन ही संगीत है और संगीत ही जीवन है। साधारण सा प्रतीत होने वाला संगीत जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं लाभप्रद है। सुर-ताल से बंधा हुआ यह जीवन सांसों की लय पर चलने वाला मधुर संगीत ही तो है। सांसों के विराम लेते ही यह जीवन संगीत थम जाता है। योग यदि शरीर विज्ञान का आधार है तो संगीत आत्मा का भोजन है। बड़े-बड़े योगी, ऋषि-मुनि, तपस्वी अपनी योगसाधना तथा तपस्या के लिए संगीत को ही आधार बनाते रहे हैं। संगीत मनुष्य जीवन को आकर्षण तथा सुंदरता प्रदान करता है। विश्व संगीत दिवस मनाने की शुरुआत फ्रांस में 21 जून 1982 को हुई। वर्तमान में संगीत दिवस पूरी दुनिया में मनाया जाता है। इस दिन पूरी दुनिया के संगीतकार, गायक, वादक, नर्तक, रसिक तथा श्रोता संगीत का आनंद लेते हैं।

जो वीणा से संगीत पैदा होने का नियम है, वही जीवन वीणा से संगती पैदा होने का नियम भी है। जीवन वीणा की भी एक ऐसी अवस्था है, जब न तो उत्तेजना इस तरफ होती है, न उस तरफ। न खिंचाव इस तरफ होता है, न उस तरफ। और तार मध्य में होते हैं।तब न दुख होता है न सुख होता है। क्योंकि सुख खिंचाव है, दुख एक खिंचाव है। और तार जीवन के मध्य में होते हैं-सुख और दुख दोनों के पार होते हैं। वहीं वह जाना जाता है जो आत्मा है, जो जीवन है, आनंद है।

आत्मा तो निश्चित ही दोनों के अतीत है। और जब तक हम दोनों के अतीत आंख को नहीं ले जाते, तब तक आत्मा का हमें कोई अनुभव नहीं होगा।

0 comments: