राग परिवार (रागंग) और मिश्रित राग (जोड़ राग) || Raga Parivar (Ragang) and Mixed Raga (Jod Raga)|| गंभीर रागों का परिचय ||


गंभीर रागों का परिचय

राग परिवार (रागंग) और मिश्रित राग (जोड़ राग)

 Raga Parivar (Ragang) and Mixed Raga(Jod Raga)

यह पृष्ठ भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ अधिक वजनदार रागों के माध्यम से राग परिवारों की अवधारणा की पड़ताल करता है - मलकौंस, दरबारी कनाडा, मिया मल्हार, और उनकी शाखाएं - चंद्रकौंस, संपूर्ण मालकौन्स, कौंसी कनाडा और मेघ।

राग परिवार (रागंग) तब बनते हैं जब नए राग मौजूदा रागों से प्राप्त होते हैं। एक मौजूदा राग लें और उसके पैमाने से एक नोट छोड़ दें, और आपके पास एक नया राग है। एक नया नोट जोड़ें, और आपके पास एक अलग राग है। आप राग के आरोही पैमाने में या केवल विशिष्ट नोट पैटर्न में चुनिंदा रूप से नोट्स छोड़ सकते हैं या जोड़ सकते हैं। एक ही परिवार के रागों के माधुर्य प्रोफाइल या चलन (वीडियो: "क्या चलन है?") अक्सर समान होते हैं।

उदाहरण के लिए राग मालकौन्स  को ही लें। यह सा गा मा धा नी (1, ♭3, 4, 6, 7) नोट्स का उपयोग करता है। यदि आप नी को नी से प्रतिस्थापित करते हैं, तो आपको राग चंद्रकौं (सा गा मा ध नी; 1, 3, 4, 6, 7) मिलते हैं। यदि आप मालकौन्स लेते हैं और उसमें दो नोट, रे और पा मिलाते हैं, तो आपको राग संपूर्ण मालकौन्स  (सा रे गा मा पा धा नी; 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7) मिलता है। तीनों राग कौन्स परिवार से संबंधित हैं और नोटों के समान पैटर्न का उपयोग करते हैं। इस बीच, राग दरबारी कनाडा संपूर्ण मालकौन्स(सा रे गा मा पा धा नी; 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7) के रूप में नोट्स के एक ही सेट का उपयोग करता है, लेकिन इसकी माधुर्य प्रोफ़ाइल अलग है क्योंकि इसमें है एक अलग मूल। यह कनाडा परिवार से संबंधित है। आइए एक राग से दूसरे राग की प्रगति पर एक नज़र डालें कि यह व्यवहार में कैसे काम करता है।

राग मालकौन्स  (कौन्स अंग)

मालकौन्स  एक प्राचीन राग है और हिंदुस्तानी (उत्तर भारतीय) और कर्नाटक (दक्षिण भारतीय) शास्त्रीय संगीत दोनों में बहुत महत्वपूर्ण है। यह विशाल और गहरा है, निचली पिच रेंज में सबसे अच्छा प्रदर्शन सुबह के छोटे घंटों में, मध्यरात्रि के ठीक बाद बेहद चिंतनशील गति से किया जाता है।

राग चंद्रकौंस (कौन्स अंग)

इतने सारे सपाट नोटों का उपयोग करने के बावजूद, इसके नोटों की एक समान दूरी के कारण मालकौन्स  में कोई अंधेरा नहीं है। लेकिन फ्लैट नी (♭7) को नी (7) से बदलें, और आप तुरंत पैमाने पर तनाव और अंधेरे का एक तत्व जोड़ते हैं। चंद्रकौंस एक नया राग है, जो मालकौंस से निर्मित है। मालकौन्स  की तरह ही यह आधी रात के बाद किया जाता है।

राग संपूर्ण मालकौन्स  (कौन्स अंग)

मेरे लिए संपूर्ण मालकौन्स  , मालकौन्स  का अधिक स्त्री संस्करण है। यह अपेक्षाकृत नया राग भी है और दुर्लभ भी। यह ज्यादातर जयपुर-अतरौली घराने (स्कूल) के कलाकारों द्वारा किया जाता है। एक बार फिर इस राग के लिए निर्धारित समय मध्यरात्रि के बाद का है।

राग मिया मल्हार (मल्हार अंग)

और अब मल्हार रागों में सबसे प्रसिद्ध मिया मल्हार की एक झलक के लिए। मिया मल्हार की लोकप्रियता फिल्मी गीतों सहित हल्की शैलियों में इसके विपुल उपयोग के कारण है, जहां इसे तदनुसार अधिक हल्के ढंग से व्यवहार किया जाता है। मुख्यधारा के शास्त्रीय संगीत में, हालांकि, कठिन माइक्रोटोन और भारी दोलनों के उपयोग के कारण इसे मास्टर करना एक अत्यंत कठिन राग माना जाता है। इसके वाक्यांशों की घुमावदार (वक्र) प्रकृति भी इस राग में बड़े पैमाने पर सुधार करने के लिए काफी चुनौती देती है, हालांकि स्पष्ट रूप से अद्वितीय भीमसेन जोशी के लिए नहीं।

गंभीर रागों का परिचय

राग बागेश्र्वरी 

थाट            -   काफी      

जाति          -  ओड़व - सम्पूर्ण 

वादी           -   म 

सम्वादी        -  सा

 स्वर            -  ग ,नि कोमल शेष शुद्ध 

वर्जित स्वर   -  आरोह में रे प 

समय          -   रात्रि  का दूसरा प्रहर 



यह एक गंभीर प्रकृति का राग है मधुर एक मधुर और कर्णप्रिय राग होने के कारण उप शास्त्रीय संगीत शैली में और सुगम संगीत में इसकी अनेक बंदिशें देखने को मिलती है बागेश्वरी में धनश्री और कान्हड़ा का योग माना जाता हैं इस राग की जाति के विषय में विद्वानों में मतभेद पाया जाता हैं इसका चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होता है। ग्रंथों में इसका सम प्राकृतिक राग श्रीरंजनी को बताया जाता है। 

राग बिहाग परिचय

  आरोहन में रे ध वर्जित, गावत राग बिहाग ।

प्रथम प्रहर निशी गाइये, सोहत ग-नि सम्वाद ।।

थाट         -          बिलावल 

जाती        -          औड़व-सम्पूर्ण 

लगने वाले स्वर सभी शुद्ध स्वर, तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग 

वर्जित स्वर     -      आरोह में रे और ध 

वादी      -         गांधार 

समवादी     -       निषाद 

गायन समय  - रात्रि का दूसरा प्रहर 

इस राग की रचना बिलावल ठाठ से मानी गई है।इस राग के आरोह में रे ध स्वर वर्जित और अवरोह में सातों स्वर प्रयोग किये गाए हैं इसलिए इसकी जाती औडव-सम्पूर्ण है। इसे रात्रि के प्रथम प्रहर के मध्य भाग में गाया बजाया जाता है। वादी स्वर गंधार और समवादी स्वर निषाद है।यह पूर्वांग प्रधानराग है इसलिए इसका चलन मंद्र और मध्य सप्तक में अधिक पाया जाता है। इस राग का आरोह-अवरोह इस प्रकार है-

आरोह– नि सा ग म प नि सां।

अवरोह– सां नि ध प म ग रे सा ।

पकड़– नि़ सा ग म प, म॑ प ग म ग, रे नि़ सा।

स्वरूप– गमग रेसा, निसांनि नि-प, निधप पम॑ग म, ग म ग- रे नि़ सा।

इसका ग्रह स्वर निषाद है क्योंकि इसका चलन मंद्र नि से प्रारम्भ किया जाता है जैसे- नि सा ग म प । आरोह में रिषभ और धैवत वर्जित है, किन्तु अवरोह में इनका अल्प प्रयोग है अथवा यह दुर्बल और अनुगामी माने गये है। ज़्यादातर इन्हें कण स्वर के रूप में अवरोह में प्रयोग करते है, जैसे- सां नि s धप, ध प गम ग s रेसा । यदि यह स्वर प्रबल हो जाएँगे तो इसमें राग बिलावल की छाया आने लगेगी। इसकी प्रकृति गंभीर मानी गयी है इसलिए इसमें विलंबित ख्याल, द्रुत ख्याल तथा तराना गाया जाता है। इसमें गंधार वादी स्वर के साथ अंश स्वर और न्यास-बहुत्व स्वर भी है। जैसे- नि़ सा ग, ग म प ग म ग, प म॑ ग, म ग s सा। राग की सुंदरता और रंजकता बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोह में तीव्र मध्यम का प्रयोग पंचम के साथ विवादी स्वर की तरह किया जाता है, जैसे- प म॑ ग म ग, रेसा। आजकल तीव्र मध्यम प्रयोग इतना अधिक बढ़ गया है की इसे राग का आवश्यक स्वर माना जाने लगा है। इसका अधिक प्रयोग होने से कुछ लोग इसे कल्याण ठाठ का राग मानने लगे है। कुछ गायक बिहाग में तीव्र म का प्रयोग बिल्कुल नहीं करते और उसे शुद्ध बिहाग कहते हैं।कुछ कलाकारों का मानना है की आलाप करते समय तीव्र मध्यम और मंद्र निषाद पर मंद आवाज़ से न्यास किया जाए तो निराशा और हृदय में संवेदना उत्पन्न होगी।यह एक शुद्ध राग है क्योंकि इसमें किसी दूसरे राग की छाया या मिश्रण नहीं है। इसके अन्य प्रकार है- बिहागड़ा, नटबिहाग, मारूबिहाग, पटबिहाग, आदि।

सप्त वैदिक स्वर || सप्त स्वर का अर्थ || Seven Vedic Vowels || meaning of seven vowels ||

* सप्त वैदिक स्वर को विश्तार से समझाए। 

प्रागैतिहासिक काल से ही भारत में संगीत की परम्परा समृध्दि रही है। केवल कुछ देशों में ही संगीत की इतनी पुरानी एवं इतनी समृद्धि परम्परा पाए जाती है। माना जाता है कि संगीत का प्रारम्भ सिंधु घाटी की संभ्यता के काल में हुआ , हालांकि इस बात का एकमात्र साक्ष्य है उस समय की एक नृत्य बाला की मुद्रा में कांस्य मूर्ति और नृत्य ,नाटक और संगीत के देवता रूद्र अथवा शिव की पूजा का प्रचलन। 

सिंधु घाटी की सभ्यता के एक पतन के पश्चात वैदिक संगीत की अवस्था का प्रारम्भ हुआ , जिसमे संगीत की शैली में भजनों और मन्त्रों के उच्चारण से ईश्वर की पूजा और अर्चना की जाती थी। इसके अतिरिक्त दो भारतीय महाकाव्यों - रामायण और महाभारत की रचना में संगीत का प्रमुख प्रभाव रहा। भारत में सांस्कृतिक काल से लेकर आधुनिक युग तक आते - आते संगीत की शैली और पद्धति में व्यापक परिवर्तन हुआ है। 

भारतीय संगीत का आदि रूप वेदों में मिलता है , वेद के काल के विषय में विद्वानो में बहुत मतभेद है , किन्तु उसका काल ईसा से लगभग 2000 वर्ष पर्व था। इस पर प्रायः सभी विद्वान सहमत है , इसलिए भारतीय संगीत का इतिहास कम से कम 8000 वर्ष प्राचीन है। 

वेदो में बीन , वीणा और कर्करि इत्यादि तंतु वाद्यों का उल्लेख मिलता है। अवनद्य वाद्यों में दुंदुभि , गर्गर इत्यादि का घन वाद्यों में आघात या आघाटी और सुषिर वाद्यों में बाकुर , नाड़ी , तूठाव , शंख इत्यादि का उल्लेख है। 

यजुर्वेद में 30 वें काण्ड के 22 वें और 20 वें मन्त्र में कई वाद्य बजाने वालों का उल्लेख है। इसमें यह सिद्ध होता है कि उस समय तक कई प्रकार के वाद्यवादन का व्यवासय हो चला था। विश्वभर में सबसे प्राचीन संगीत सामवेद में संगीत से इतना घनिष्ट सम्बन्ध था कि साम को स्वर का पर्याय समझने लग गए थे। 

* ' का साम्नो गतिरिति ?स्वर इति होवाच '

अर्थात 'साम की गति क्या है ?'

उत्तर 'स्वर !' साम का ' स्वर ' अपनापन ' स्वर ' ही। तस्य हितस्य साम्नों च:स्व वेद , भक्ति हास्य स्व , तस्य स्वर एवं स्वम। 'अर्थात जो साम के स्वर को जानता है , उसे 'स्व' प्राप्त होता है।  साम का 'स्व' ही स्वर है। 

वैदिक काल में तीन स्वरों का गान ' सामिक ' कहलाता था। ' सामिक ' शब्द से ही ज्ञान होता है कि पहले ' साम ' तीन स्वरों से ही गाया जाता था।  ये स्वर ' ग रे सा ' थे। धीरे - धीरे गान चार , पांच , छः और सात स्वरों के होने लगे।  छः और सात स्वरों के तो बहुत ही कम साम मिलते हैं। अधिक ' साम ' तीन से पांच स्वरों तक के मिलते हैं। 

साम के स्वरों की , जो संज्ञाएँ हैं उनसे उनकी प्राप्ति के क्रम का पता चलता है।  सांगायकों को सर्वप्रथम 'ग ,रे , सा ' स्वरों की प्राप्ति हुई। इनका नाम प्रथम , 

द्वातिय , तृतीय हुआ। इनके अंतर , 'नि' की प्राप्ति हुई , जिसका नाम चतिर्थ हुआ। अधिकतर साम इन्ही चार स्वरों के मिलते हैं। इन चारों स्वरों के नाम सख्यात्मक शब्दों में हैं।  इनके अनन्तर जो स्वर मिले , उनके नाम वर्णनात्मक़ शब्दों द्वारा व्यक्त किये गए हैं। इसमें इस कल्पना की पुष्टि होती है कि इनकी प्राप्ति बाद में हुई। 

'गांधार' से एक ऊँचे स्वर 'मध्यम' की भी प्राप्ति हुई , जिसका नाम 'क्रष्ट' हुआ , तो उसका नाम 'मंद'(गंभीर) पड़ा। जब भी इसमें निचे के एक और स्वर की प्राप्ति हुई , तो उसका नाम 'अतिस्वार'अथवा 'अतिस्वार्य' पड़ा। इसका अर्थ है स्वरण ( ध्वनन ) करने की अंतिम सीमा। 

साम का ग्राम अवरोही क्रम

साम         आधुनिक 

क्रुष्ट          मध्यम    ( म )

प्रथम         गांधार   ( ग )

द्वातिय       ऋषभ   ( रे )

तृतीय        षडज   ( स )

चतुर्थ         निषाद  ( नि )

मंद            धैवत     ( ध )

अतिस्वार्य   पंचम  ( प )   

 सप्त स्वर

भारतीय संगीत आधारित है स्वरों और ताल के अनुशासित प्रयोग पर। सात स्वरों के समुह को सप्तक कहा जाता है। भारतीय संगीत सप्तक के सात स्वर हैं-

सा(षडज), रे(ऋषभ), ग(गंधार), म(मध्यम), प(पंचम), ध(धैवत), नि(निषाद)

अर्थात

सा, रे, ग, म, प ध, नि

सा और प को अचल स्वर माना जाता है। जबकि अन्य स्वरों के और भी रूप हो सकते हैं। जैसे 'रे' को 'कोमल रे' के रूप में गाया जा सकता है जो कि शुद्ध रे से अलग है। इसी तरह 'ग', 'ध' और 'नि' के भी कोमल रूप होते हैं। इसी तरह 'शुद्ध म' को 'तीव्र म' के रूप में अलग तरीके से गाया जाता है।

गायक या वादक गाते या बजाते समय मूलत: जिस स्वर सप्तक का प्रयोग करता है उसे मध्य सप्तक कहते हैं। ठीक वही स्वर सप्तक, जब नीचे से गाया जाये तो उसे मंद्र, और ऊपर से गाया जाये तो तार सप्तक कह्ते हैं। मन्द्र स्वरों के नीचे एक बिन्दी लगा कर उन्हें मन्द्र बताया जाता है। और तार सप्तक के स्वरों को, ऊपर एक बिंदी लगा कर उन्हें तार सप्तक के रूप में दिखाया जाता है। इसी तरह अति मंद्र और अतितार सप्तक में भी स्वरों को गाया-बजाया जा सकता है।

अर्थात- ध़ ऩि सा रे ग म प ध नि सां रें गं...

संगीत के नये विद्यार्थी को सबसे पहले शुद्ध स्वर सप्तक के सातों स्वरों के विभिन्न प्रयोग के द्वारा आवाज़ साधने को कहा जाता है। इन को स्वर अलंकार कहते हैं।

आइये कुछ अलंकार देखें

1) सा रे ग म प ध नि सां (आरोह)
सां नि ध प म ग रे सा (अवरोह)

(यहाँ आखिरी का सा तार सप्तक का है अत: इस सा के ऊपर बिंदी लगाई गयी है)

इस तरह जब स्वरों को नीचे से ऊपर सप्तक में गाया जाता है उसे आरोह कहते हैं। और ऊपर से नीचे गाते वक्त स्वरों को अवरोह  कहते हैं।

और कुछ अलंकार देखिये-

2)सासा रेरे गग मम पप धध निनि सांसां ।
सांसां निनि धध पप मम गग रेरे सासा।

3) सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनि, धनिसां।
सांनिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा।

4) सारे, रेग, गम, मप, पध, धनि, निसां।
सांनि, निध, धप, पम, मग, गरे, रेसा।

5) सारेगमप, रेगमपध, गमपधनि, मपधनिसां।
सांनिधपम, निधपमग, धपमगरे पमगरेसा।

6)सारेसारेग, रेगरेगम, गमगमप, मपमपध, पधपधनि, धनिधनिसां।
सांनिसांनिध, निधनिधप, धपधपम, पमपमग, मगमगरे, गरेगरेसा।

7)सारेगसारेगसारेसागरेसा, रेगमरेगमरेगरेमगरे, गमपगमपगमगपमग, मपधमपधमपमधपम, पधनिपधनिपधपनिधप, धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि, सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां।

सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि,धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, पधनिपधनिपधपनिधप, मपधमपधमपमधपम, गमपगमपगमगपमग, रेगमरेगमरेगरेमगरे, सारेगसारेगसारेसागरेसा।

पाणिनि की अष्टाध्यायी में संगीत || Music in Panini's Ashtadhyayi || पाणिनि की जीवनी ||

 

पाणिनि की अष्टाध्यायी में संगीत 

हरिवंश महाभारत का खिल - ग्रन्थ माना जाता है। इसलिए महाभारत के साथ ही साथ हरिशवंश में जो संगीत की सामग्री मिलती है उसका भी वर्णन दे दिया गया। हरिवंश एक पुराण माना जाता है। इसलिए हरिवंश के साथ ही अन्य पुराणों में जो संगीत की चर्चा है उस पर भी विचार किया गया है। यह सब सुविधा की दृष्टि से किया गया है। 

कला की दृष्टि से देखा जाए तो पाणिनि का काल लिखित पुराणों के काल से पूर्व का है। पाणिनीकृत अष्टाध्यायी व्याकरण का सबसे विख्यात ग्रन्थ है। यद्यपि पाणिनि का विषय व्याकरण था तथापि भूगोल , वाणिज्य , शासन , मुद्रा , संगीत - सम्बन्धी जो शब्द प्रयोग में थे उनकी सिध्दि के समय गौण रूप से इनसे सम्बन्ध विषयो की झलक भी पाणिनि के व्याकरण में मिल जाता है। 

पाणिनि के काल के सम्बन्ध में विद्वानों में थोड़ा सा मतभेद है। डॉ ० वासुदेव - शरण अग्रवाल ने अपने ' पाणिनिकालीन भारतवर्ष ' में प्रबल प्रमाणों से यह सिद्ध कर दिया है कि पाणिनि का काल ई ० पू ० लगभग पाँचवीं शती था। 

अब हमें यह देखना है कि पाणिनि की अष्टाध्याय में संगीत - विषयक क्या उल्लेख मिलता है ? डॉ ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने अपनी उक्त पुस्तक में बतलाया है कि अष्टाध्याय में गीति ( 3 . 3 . 95 ), गेय ( 3 . 4 . 68 ),गायक (3 . 1 . 146 ), गायन अर्थात गाने वाला ( 3 . 1 . 147 ), नर्तक (3 . 1 . 145 ) और परिवादक ( 3 . 2 . 146 ) का उल्लेख आया है। संगीत एक शिल्प माना जाता था। प्राचीन समय में ' कला ' के स्थान पर शिल्प का ही अधिक प्रयोग था। अष्टध्याय के नट - सूत्रों से पता चलता है कि नाट्य की उस समय तक पर्याप्त उन्नति हो चुकी थी। पाणिनि ने कई नटसूत्रकार गिनाये हैं , किन्तु उनमे भरत का नाम नहीं लिया है जिससे प्रतीत होता है कि उस समय तक भरत के नाट्यशास्त्र की रचना नहीं हुई थी। 

अष्टध्यायी (2 . 4 . 2 ) के सूत्र में ' तुर्याडग ' का उल्लेख मिलता है। ' तूर्य ' वाद्य की एक बहुत प्राचीन संज्ञा है। ( तुर्यते ताड्यते इति ). जो ताड़ित किया जाय अर्थात जिसका हाथ अथवा किसी अन्य वस्तु से हनन किया जाए। वह सब ' तूर्य ' ( वाद्य ) है। तूर्य के अङ्ग को तुर्याङ्ग कहते थे। ये एक साथ बजते थे, जैसे 'मार्दङ्गक - पाणिनीकाम ' मृदङ्ग के बजाने वाले को मार्दङ्गक और पणव को बजाने वाले को पाणविका कहते थे और दोनों को साथ बजाने वाले जुट को ' मार्दङ्गकपाणविकम ' कहते थे। 

एक दूसरा उदाहरण जो काशिका ने दिया है वह है -' वीणावादक - परिवादकम ' का। मेदिनी कोश ने ' परिवाद ' का अर्थ दिया है ' वीणावादनवस्तु ' अर्थात वह चीज जिसमे वीणा बजाई जाती है। यह कर्मिक अथवा नखी जैसी कोई चीज रही होगी। ' परिवादक ' उसको कहते थे जो वीणा को परिवाद से बजाता था। यदि पाणिनि के समय में ' वीणावादक - परिवादकम ' का प्रयोग प्रचलित था तो उस समय वीणावाद और परिवाद दो पृथक वादकों का जुट होता रहा होगा इसमें ऐसा प्रतीत होता है कि पाणिनि के समय में ' वीणा ' दो  प्रकार से बजाई जाती रही होगी - एक साधारण रूप से ,नख मात्र से , बिना किसी परिवाद के सहारे और दूसरे - परिवाद के द्वारा। पतञ्जलि ने अपने भाष्य में परिवादक को परिवाद द्वारा वीणा बजाने वाला कहा है। 
पाणिनि की  जीवनी 
ऋषि पाणिनि
पाणिनी (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व या “छठी से पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व”) प्राचीन भारत में एक प्राचीन संस्कृत व्याकरण और श्रद्धेय विद्वान थे।
भाषा विज्ञान के जनक माने जाने वाले पाणिनी महाजनपद काल में उत्तर पश्चिम भारतीय उपमहाद्वीप में रहते थे।
कहा जाता है कि उनका जन्म सिंधु और काबुल नदियों, पाकिस्तान के एक छोटे से शहर, प्राचीन गांधार के शालतुला में हुआ था।
ऋषि पाणिनि
पाणिनि को उनके पाठ अष्टाध्यायी के लिए जाना जाता है, जो संस्कृत व्याकरण पर सूत्र शैली का ग्रंथ है, 3,959 “छंद” या भाषाविज्ञान वाक्यविन्यास और शब्दार्थ “आठ अध्याय” पर नियम जो वेदांग की व्याकारायण शाखा का संस्थापक पाठ है।
भाषा की उनकी औपचारिकता भरत मुनि द्वारा नृत्य और संगीत की औपचारिकता में प्रभावशाली रही है। उनके विचारों ने बौद्ध धर्म जैसे अन्य भारतीय धर्मों के विद्वानों की टिप्पणियों को प्रभावित और आकर्षित किया।
अष्टाध्यायी
अष्टाध्यायी पाणिनी के व्याकरण का केंद्रीय भाग है, और अब तक का सबसे जटिल है।
पाठ इनपुट के रूप में शाब्दिक सूचियों से सामग्री लेता है और अच्छी तरह से निर्मित शब्दों की पीढ़ी के लिए उन पर लागू होने वाले एल्गोरिदम का वर्णन करता है।
यह अत्यधिक व्यवस्थित और तकनीकी है। इसके दृष्टिकोण में निहित स्वनिम शब्द का भाग और रूट की अवधारणाएं हैं।
अष्टाध्यायी
अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का पहला वर्णन नहीं था, लेकिन यह जल्द से जल्द पूरा हुआ है। वैद्य, वेदांग, वेदांग की नींव बन गया।
पाणिनी ने एक तकनीकी मेटा भाषा का उपयोग किया जिसमें एक वाक्यविन्यास, आकारिकी और शब्दकोश शामिल हैं।
अष्टाध्यायी के आठ अध्यायों में 3,959 सूत्र या “कामोद्दीपक सूत्र” हैं, जो प्रत्येक चार खंडों या पादों (पादह) में विभाजित हैं। इस पाठ ने एक प्रसिद्ध और सबसे प्राचीन भास्य (भाष्य) को आकर्षित किया जिसे महाभाष्य कहा जाता है।
शिव सूत्र
शिव सूत्र या माहीवारा कृष्ण चौदह श्लोक हैं जो संस्कृत के स्वरों को व्यवस्थित करते हैं जैसा कि पाणिनी के अष्टाध्यायी में वर्णित है, जो संस्कृत व्याकरण का संस्थापक ग्रंथ है।
परंपरा के भीतर उन्हें अक्षरास्मनाय के रूप में जाना जाता है, “स्वरों का सस्वर पाठ,” लेकिन उन्हें लोकप्रिय रूप से शिव सूत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि उनके बारे में कहा जाता है कि वे शिव से पाणिनि के लिए प्रकट हुए थे।
महाभाष्य
अष्टाध्यायी के बाद, महाभाष्य संस्कृत व्याकरण पर अगला आधिकारिक कार्य है। पतंजलि के साथ संस्कृत व्याकरण अपने चरम पर पहुंच गया और भाषाई विज्ञान को इसका निश्चित स्वरूप मिल गया।
ऋषि पाणिनि के पहले और बाद में कई वैयाकरण थे, जो न केवल भाषाविद् थे, बल्कि व्याकरणिक भी थे।
ऋषि पाणिनि स्वयं उनमें से लगभग 16 का उल्लेख करते हैं। पाणिनि परंपरा के 16 स्कूलों को संदर्भित करता है जो वाल्मीकि द्वारा रामायण में वर्णित 9 व्याकरणिक परंपराओं से अलग है।
नियम
पहले दो सूत्र इस प्रकार हैं:
वृद्धिरादैच
अद्यनगुनः
दो सूक्तों में एक सूक्तियों की सूची होती है, उसके बाद एक तकनीकी शब्द आता है; उपरोक्त दो सूक्तों की अंतिम व्याख्या इस प्रकार है:
(ए, एआई, एयू ) को विद्धी कहा जाता है।
(ए, ई, ओ ) को गुणा कहा जाता है।

भाररतीय संगीत के आदि प्रेरक || Adi Motivational of Indian Music || Bhartiya sangeet ke janak kaun hai || who is the father of indian music ||

 

भाररतीय संगीत के आदि प्रेरक 

हम भारतीय संगीत के इ इतिहास के तथ्यों को खोजने का पर्यत्न  करेंगे। 'इतिहास' शब्द इति + ह + आस से बना है ' इति ' का अर्थ है 'ऐसा'. ' ह ' का अर्थ है निश्चयपूर्वक। ' आस ' का अर्थ है ' था ' . इति + ह + आस अर्थात ' इतिहास ' का अर्थ है ' निश्चयपूर्वक ऐसा था । ' इसलिए अपने शास्त्रों में घटनाओं के कर्म - मात्र को इतिहास नहीं कहते , जो परम्परागत बातें चली आई हैं , वे भी इतिहास में सम्मिलित  है। हमारे जितने संगीत - शास्त्र है ,वे सभी यह मानते चले आये हैं कि हमारी संगीतकला के आदि प्रेरक और उपदेशक  देव - देवी रहे  हैं।  इस विश्वास को कपोलकल्पित कहकर हँसी में उड़ा देने को मनोवृत्ति उपयुक्त नहीं जान पड़ती है। 

शिव , ब्रह्मा , सरस्वती , गन्धर्व और किन्नर को जो हम अपनी संगीत - कला के आदि प्रेरक मानते चले आये हैं , इसके मूल में यही भावना है कि संगीत - कला दैवी प्रेरणा से ही प्रादुर्भूत हुई है। यद्यपि संगीत मानव के लिए स्वाभाविक है तथापि कला के रूप में यह दिव्य प्रेरणा से ही आया होगा।  संगीत वह सुंदर , सुरभि , सरस है जो बिना स्वर्ग के प्राणदायक , शीतल ओसकण के खिलता ही नहीं। हमारे ऋषियों और आचार्यों का यह विश्वास है कि शंकर के डमरू से वर्ण और स्वर दोनों उत्पन्न हुए। शंकर की शक्ति पार्वती , दुर्गा भी संगीत की प्रेरक मानी गयी हैं। 

ब्रह्मा भी संगीत के प्रेरक के रूप में स्मरण किये गये हैं। ब्रह्मा शब्द बृह अथवा बृहं धातु से बना है। इस धातु का अर्थ है आत्मविस्तार , ध्वनि होना , ध्वनि के द्वारा हृदय के भावों को अभिव्यक्त करना। ब्रम्हा के मूल में ही शब्द या नाद है। अतः इन्हे संगीत का प्रेरक मानना सर्वथा उपयुक्त है। 

सरस्वती भी संगीत के आदि प्रेरकों में से स्मरण की गयी हैं। सरस्वती ब्रम्हा की शक्ति का ही नाम है। ' सरस्  + वती ' शब्द सृ धातु से बना है जिसका अर्थ है ' सरकना ' , ' गतिशील होना ' . सरस्वती ब्रम्हा की वह शक्ति हैं जिसके द्वारा ब्रम्हा में गतिशीलता आती है।  इसी शक्ति से ही ब्रम्हा विश्व का निर्माण करते हैं।  इस शक्ति का पर्याय है शब्द या नाद। अतः सरस्वती काव्य ,संगीत इत्यादि ललित कलाओं की जननी है। 

नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदयेन च ।

मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥

 भावार्थ :-

अमुक श्लोक में भगवान विष्णु जी कह रहे है, ” हे नारद ! ना तो मैं वैकुण्ठ में निवास करता हूँ , ना ही योगीजनों के हृदय में ही मेरा निवास है। मै तो वहाँ निवास करता हूँ जहां मेरे भक्तगण गायन-वादन करते है। ” 

इस एक श्लोक से ही संगीत की प्रासंगिकता प्रदर्शित होती है की स्वयं ईश्वर भी संगीत को कितनी महत्ता देते है। जैसा की हम अपने पिछले लेख में कह चुके है कि यद्यपि संगीत मानव के लिए नैसर्गिक है; तथापि संगीत ने किस प्रकार एक सुव्यवस्थित कला का रूप धारण किया, उसका एक इतिहास है। अब हम भारतीय संगीत के इतिहास के विभिन्न संयोगी तथ्यों पे प्रकाश डालने का कार्य करेंगे।  

संगीत के ऐतिहासिक दृष्टिकोण को दृष्टिगत करें, तो संगीत की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता, क्योकि संगीत प्राचीन काल से ही प्रकृति के गोदी में पले मानव के प्रयत्नों से ही पनपा है और सदा से ही मनुष्य के हृदय को झंकृत और मन को आनंदित करता आया है। “

 इतिहास ‘ शब्द इति+आस  से बना है। ‘ इति ‘ का अर्थ है ‘ ऐसा ‘।  ‘ ह ‘ का अर्थ है निश्चयपूर्वक। ‘आस ‘ का अर्थ है ‘ था ‘।  इति+ह+आस  अर्थात  ‘ इतिहास ‘ का अर्थ है ‘ निश्चयपूर्वक ऐसा था ‘।  इसीलिए अपने शास्त्रों में घटनाओं के क्रम-काल को इतिहास कहते है, जो परंपरागत बातें चली आयी है, वे भी इतिहास में सम्मिलित हैं।  हमारे जितने संगीत-शास्त्र है, वे सभी यह मानते चले आये है कि हमारी संगीतकला के आदि प्रेरक और उपदेशक देव-देवी रहे हैं।  इस विश्वास को काल्पनिक कहकर हंसी में उड़ा देने की मनोवृत्ति उपयुक्त नहीं जान पड़ती।  

शिव, ब्रम्हा, सरस्वती, गन्धर्व और किन्नर को जो हम अपनी संगीत-कला का आदि प्रेरक मानते चले आए हैं, इसके मूल में यही भावना है की संगीत-कला  दैवी प्रेरणा से ही प्रादुर्भूत हुई है। संगीत के जन्म के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न विचार व्यक्त किये है।  संगीत की उत्पत्ति सर्वप्रथम वेदों के निर्माता ब्रम्हा द्वारा हुई, ब्रम्हा ने यह कला शिव को दी और शिव द्वारा सरस्वती को प्राप्त हुई।  सरस्वती से संगीत कला का ज्ञान नारद को प्राप्त हुआ।  नारद ने स्वर्ग के गन्धर्व, किन्नर तथा अप्सराओं को संगीत शिक्षा दी, वहाँ से ही भरत, हनुमान आदि ऋषि इस कला में पारंगत होकर भूलोक में संगीत के प्रचारार्थ अवतरित हुए।  पंडित अहोबल के अनुसार, ” ब्रम्हा ने भरत को संगीत की शिक्षा दी तथा पंडित दामोदर ने भी संगीत का आरंभ ब्रम्हा को ही माना है।  

यद्यपि संगीत मानव के लिए स्वाभाविक है तथापि कला के रूप में यह दिव्य प्रेरणा से ही आया होगा।  संगीत वह सुन्दर, सुरभ, सरस पद्म है जो बिना स्वर्ग के प्राणदायक, शीतल ओसकण के खिलता ही नहीं।  हमारे ऋषियों और आचार्यों का यह विश्वास है की शंकर के डमरू से वर्ण और स्वर दोनों उत्पन्न हुए है।  शंकर की शक्ति पार्वती, दुर्गा भी संगीत की प्रेरक मानी गयी है।  

ब्रम्हा भी संगीत के प्रेरक के रूप में स्मरण किये गए है।  ब्रम्हा शब्द बृह अथवा बृह् धातु से बना है।  इस धातु का अर्थ है आत्मविस्तार, ध्वनि होना, ध्वनि के द्वारा हृदय के भावों को व्यक्त करना।  ब्रम्हा के मूल में ही शब्द या नाद है।  अतः इन्हें संगीत का प्रेरक मानना सर्वथा उचित है, उपयुक्त है।

सरस्वती भी संगीत के आदि प्रेरकों में से स्मरण की गयी हैं।  सरस्वती ब्रम्हा की शक्ति का ही नाम है।  ‘ सरस + वती ‘ शब्द सृ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘ सरकना ‘, ‘ गतिशील होना ‘।  सरस्वती ब्रम्हा की वह शक्ति है जिसके द्वारा ब्रम्हा में गतिशीलता आती है।  इसी शक्ति से ब्रम्हा विश्व का निर्माण करते है।  इस शक्ति का पर्याय है शब्द या नाद।  अतः सरस्वती काव्य, संगीत इत्यादि की कलाओं की जननी हैं।

एक ग्रंथकार के अनुसार, ” नारद ने अनेक वर्षों तक योग साधना की, तब शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें संगीत कला प्रदान की थी।  पार्वती की शयन मुद्रा को देखकर शिव ने उनके अंग-प्रत्यंगों के आधार पर रूद्र-वीणा बनायी और अपने पांच मुखों से पांच रागों की उत्पत्ति की।  तत्पश्चात छठा राग पार्वती के मुख द्वारा उत्पन्न हुआ।  शिव के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और आकाशोन्मुख होने से क्रमशः भैरव, हिंडोल मेघ , दीपक और श्री राग प्रकट हुए तथा पार्वती द्वारा कौशिक राग की उत्पत्ती हुई। 

कुछ विद्वान संगीत का उद्भव ‘ ओउम ‘ शब्द से मानते हैं, यह एकाक्षर ओउम अपने अंदर तीन शक्तियों को समाहित किये हुए है अ,उ, म यह तीनों ही शक्ति का प्रतीक है। ‘ अ ‘ शब्द जन्म व उत्पत्ति का प्रतीक है।  अतः ओउम वेदों का बीज मंत्र है इसी बीज मंत्र से सृष्टि की उत्पत्ति मानी गयी है और इसी से नाद की उत्पत्ति हुई है।  इस प्रकार शब्द और स्वर दोनों की उत्पत्ति ओउम से ही मानी गयी है। मनु का कथन है कि, ” ऋग्वेद,सामवेद व यजुर्वेद में  अ,उ, म में तीन अक्षर मिलकर प्रणव बना, श्रुतिस्मृति के अनुसार यह प्रणव ही परमात्मा का अति सुन्दर नाम है। 

ओउम ही संगीत के जन्म का मुख्य आधार है, यह सत्य तो पाश्चात्य विद्वान् भी मानते है इन्होने ओउम शब्द को एक विशेष शक्ति के रूप में माना है एवं इस शब्द के बोलने से शरीर में एक विशेष प्रकार का स्पंदन होता है।  ओउम की साधना से संगीत का समस्त ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, क्योकि इसमें स्वर, लय, ताल तीनों का समावेश है।  एकमात्र शब्दमय साक्षात् शब्द ब्रम्ह ओउम ही है।  

 ब्रम्ह स्वर व नाद शब्द दोनों का ही उद्गम ओउम के गर्भ से ही हुआ है।  सर्वप्रथम स्वर निकले, सत्यता यही मानी जा सकती है कि यह ओउम शब्द ही संगीत के जन्म का कारण है आध्यात्मिक विद्वानों के मत से जिस प्रकार ब्रम्हा जी के बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती है उसी प्रकार वैज्ञानिकों के मतानुसार नाद के बिना सृष्टि की कल्पना करना असंभव है।  अतः सम्पूर्ण सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में संगीत की अखंड धारा सदियों से प्रवाहित है और सदैव रहेगी। 

हमारे ही देश में देव-देवी को संगीत का प्रेरक माना हो, ऐसी बात नहीं है।  यूरोप में भी यह विश्वास रहा है।   यूरोप, अरब, फारस में जो संगीत के लिए शब्द हैं उस पर ध्यान देने से इसका रहस्य प्रकट हो जाएगा।  संगीत के लिए यूनानी भाषा में शब्द है ‘ मौसीक़ी ‘ , लैटिन में मुसिका, फ्रांसीसी  में मुसीक, पोर्तुगी में मुसिका, जर्मन में मूसिक,अंग्रेजी में म्यूजिक, इब्रानी, अरबी और फ़ारसी में मौसिकी। इन शब्दों में साम्य है।  ये सभी शब्द यूनानी भाषा के ‘ म्यूज ‘ शब्द से बने है।   ‘ म्यूज ‘ यूनानी परंपरा में काव्यऔर संगीत की देवी मानी गई है।  कोष में ‘ म्यूज ‘ शब्द का अर्थ दिया गया है ‘ दि इंस्पायरिंग गॉडेस ऑफ़ सांग ‘ अर्थात ‘ गान की प्रेरक देवी ‘ यूनान की परंपरा में ‘ म्यूज ‘ ‘ ज्यौँस ‘ की कन्या मानी गयी है। ‘ ज्यौँस ‘ शब्द संस्कृत के ‘ द्यौंस ‘ का ही रूपांतर है जिसका अर्थ है ‘ स्वर्ग ‘।‘ ज्यौँस ‘ और ‘ म्यूज ‘ की धारणा ब्रम्हा और सरस्वती से बिलकुल मिलती-जुलती है।  अतः यह बात नहीं है कि भारत के ही आचार्यों ने देव-देवी  को संगीत का आदि प्रेरक माना गया है, सारे जगत का यही विश्वास रहा है।  

इन दिव्य शक्तियों के अतिरिक्त  गन्धर्व स्वर्ग के संगीतकार माने गए है।  इनमें भी मानव को संगीत की प्रेरणा मिली है।  संगीत-शास्त्र में नारद जी गन्धर्वों में से स्मरण किये गए हैं।  यह वीणा के अविष्कारक माने गए हैं और नर और देव के बीच के दूत। ऐसा विश्वास रहा है कि शिव, ब्रम्हा, सरस्वती इत्यादि से पहले नारद ने संगीत सीखा और नारद के द्वारा यह कला भूलोक में आई।  

किन्नर भी गन्धर्वों में से स्मरण किये गए हैं।  ‘ किन्नर ‘ की  व्युत्पत्ति है ‘ किम नरः ‘ अर्थात क्या नर है अथवा यह कैसा नर है ? ‘ किन्नर ‘ का पर्यायवाची है ‘ किम्पुरुष ‘ जी कि उपर्युक्त व्युत्पत्ति की पूर्ण रूप से पुष्टि करता है।  संसार भर का यह पौराणिक विश्वास रहा है कि किन्नर या गन्धर्व का शरीर तो मनुष्य से मिलता है और शिर अश्व से अथवा शिर मनुष्य से मिलता है और शरीर अश्व से।  किन्नर और गन्धर्व  मानव और देव के बीच के कोई प्राणी माने गए है। किन्नर और गन्धर्व से मिलते-जुलते संसार की और भाषाओं में भी शब्द मिलते हैं जो कि भाषा-विज्ञान की दृष्टि से किन्नर और गन्धर्व के रूपांतर मात्र हैं।  उदाहरणार्थ, गन्धर्व को यूनानी भाषा में केंटार कहते हैं जिसका वर्ण-विन्यास लैटिन में कंतौर हो गया है।  अवेस्ता और प्राचीन ईरानी भाषा में इन्हें गंदरव और तमिल में कुदिराई  कहते हैं।  तमिल में ‘ कुदिराइ ‘ शब्द का अर्थ होता है ‘ अश्व ‘।  

इन सभी विश्वासों का मथितार्थ यही है कि संगीत-कला स्वर्गीय है, दिव्य है और दैवी शक्ति की प्रेरणा से ही यह भूलोक में उतरी  है।  यहाँ तक कि भारत में जिन लोगों ने संगीत कला के रूप में अपने जीवन में अपनाया वे सब भी गन्धर्व कहलाने लगे।  उनकी विद्या का नाम पड़ा गन्धर्व-वेद और कला का गान्धर्व। 

गान्धर्व-कला में गीत सबसे प्रधान रहा है।  आदि में ज्ञान था।  वाद्य का निर्माण पीछे हुआ।  गीत की प्रधानता रही।  यही कारण है कि चाहे गीत हो, चाहे वाद्य, सबका नाम ‘ संगीत ‘ पड गया।  पीछे से नृत्य का भी अंतर्भाव हो गया।  संसार की जितनी आर्य भाषाएँ हैं उनमें संगीत शब्द अच्छे प्रकार के गाने के अर्थ में मिलता है।  ‘ संगीत ‘ शब्द ‘ सम + गै ‘ धातु से बना है।  और भाषाओं में ‘ सं  ‘ का ‘ सिं ‘ हो गया है और ।  ‘ गै ‘ या ‘ गा ‘ धातु ( जिसका भी अर्थ गाना होता है ) किसी न किसी रूप में इसी अर्थ में अन्य भाषाओं में भी वर्तमान है। ऐंग्लोसेक्शन में इसका रूपांतर है ‘ सिंगन ‘ जो कि आधुनिक अंग्रेजी में हो गया है  ‘ सिंग ‘; आइसलैंड की भाषा में इसका रूप है सिंग ( केवल वर्ण विन्यास में अंतर आ गया है ); डैनिश भाषा में है ‘ सिंग ‘; डच में है ‘ सिंगन ‘; जर्मन में है ‘ सिंगन ‘।  अरबी में गाना शब्द है जो ‘ गान ‘ से पूर्णतः मिलता है।  

यह सब ‘ सं गै ‘ या ‘ सं गा ‘ के रूपांतर हैं।  संसारभर की मुख्य भाषाओं के एक ही समानार्थक शब्द का इतना साम्य कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह इस तथ्य को सिद्ध करता है कि मानव में संगीत या संगान पहले गीत या गान के रूप में प्रकट हुआ।  वाद्य इत्यादि का पीछे प्रादुर्भाव हुआ।

|| संगीत क्या है संगीत के प्रकार || What are the types of Indian music ? || भारतीय संगीत कितने प्रकार के होते हैं ? || Hindustani sangeet paddhati ||

 

सांगीतिक पारिभाषिक शब्दावलियाँ 

गीत , वाद्य और नृत्य ये तीनो मिलाकर 'संगीत' कहलाते हैं। संगीत में भी ऐसे शब्द जो किसी विशेष ज्ञान के क्षेत्र में एक निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होते है , उन्हें सांगीतिक पारिभाषिक शब्द या शब्दावलियाँ कहते हैं। 

संगीत 

* ' संगीत 'शब्द ' गीत ' शब्द में 'सम ' उपसर्ग लगाने से बना है।  ' सम ' अर्थात सहित और ' गीत ' अर्थात ' गान। ' गान के सहित अर्थात अंगभूत क्रियाओं  ( नृत्य )  व वादन के साथ कीया हुआ कार्य ' संगीत ' कहलाता है।  सामान्य बोलचाल की भाषा में संगीत से आशय केवल गायन से समझा जाता है , किन्तु संगीतशास्त्र में गायन , वादन और नृत्य तीनो विधाओं को सामूहिक रूप से संगीत कहते हैं। इस प्रकार के मुख्य रूप से तीन अंग गायन , वादन एवं नृत्य है। 

* पं. शारंगदेव द्वारा लिखित संगीत रत्नाकर में कहा गया है ''गीत वाद्य तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते '' अर्थात गाना , बजाना तथा नृत्य इन तीनो का सम्मिलित रूप संगीत कहलाता है। 

* पश्चिमी देशों में संगीत से आशय केवल गायन और वादन से समजा जाता है। वहाँ  नृत्य को संगीत के अंतर्गत नहीं रखा जाता है। 

* गायन , वासन और नृत्य का एक - दूसरे से घनिष्ट सम्बन्ध रहा है। ये तीनो विधाएँ एक - दूसरे की पूरक मानी जाती है। परन्तु इन तीनो विधाओं का स्वतंत्र रूप से भी प्रदर्शन किया जा  सकता है। 

* नृत्य से पारिभाषिक आशय है कि गाते - बजाते समय भाव - प्रदर्शन के लिए थोड़ा बहुत हाथ चलाना , गाते समय मुखाकृत बनाना अर्थात शरीर की  भाव - भगिमाएँ आदि नृत्य के अंतर्गत आते हैं। 

* संगीत रत्नाकर में कहा गया है कि  नृत्य , वादन पर और वादन , गायन पर आश्रित है। 

     नृत्य विद्यानुगं प्रोक्त वाद्यगीतानुवर्चित '

अतः इन  तीनो में गायन सर्वश्रेष्ठ होता है। 

* संगीत की परिभाषा इस प्राकर दी जा सकती है '' संगीत वह ललित कला है , जिसमे स्वर और लय के  दुरा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं। .''

* संगीत के संदर्भ में याज्ञवल्क्य जी कहते है '' संगीत एक प्रकार का योग है इसकी विशेषता है  कि   इसमें साड़ी और साधन दोनों ही सुखरूप है। अतः संगीत एक उपासना है , जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ''

सामान्यतः स्वर और लय के द्वारा  अपने भावों को प्रकट करने से संगीत की रचना होती है।  संगीत को एक ललित कला  माना जाता है। 

ललित कला के अंतर्गत पाँच प्रकार की कलाएँ आती है - संगीत , ( कविता ) , काव्य , चित्रकला , मूर्तिकला एवं ( वास्तुकला ) स्थापत्य कला। 
इन ललित कलाओं में संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।  कला का माध्यम बदलते ही कला का नाम भी बदल जाता है। 
* भारतीय संगीत के इतिहास में संगीत का संबंध देवी - देवताओं से माना गया है।  माना जाता है कि सर्वप्रथम ब्रम्हा ने देवी  सरस्वती को संगीत शीक्षा दी तथा माँ सरस्वती ने नारद को संगीत शीक्षा दी। इसके बाद नारद ने भरत ने अपने नाट्यशास्त्र द्वारा जान - साधारण में संगीत का प्रचार किया। 

भारतीय संगीत में कितने प्रकार  के संगीत पद्धतियों का प्रचार है ? 
भारतीय संगीत में दो प्रकार के संगीत का प्रचार है   , जिन्हे संगीत पद्धतियाँ कहते हैं और इन्हे निम्न नाम दिए हैं 
( 1 ) उत्तरी संगीत पद्धति - उत्तरी संगीत पद्धति को हिदुस्तानि संहित पद्धति ' भी कहा जाता है। यह पद्धति उत्तरी हिदुस्तान में बंगाल , बिहार , ओडिशा , उत्तर प्रदेश , हरियाणा , पंजाब , गुजरात , जम्मू - कश्मीर तथा  महाराष्ट्र आदि प्रांतों में प्रचलित है। 
( 2 ) दाक्षिणी संगीत पद्धति  - इसे 'कर्नाटक संगीत पद्धति ' भी कहा जाता है। यह संगीत पद्धति दक्षिण भारत में जैसे - तमिलनाडु , मैसूर , आंध्र प्रदेश आदि प्रदेशों में प्रचलित है।  ये दोनों संगीत पद्धतियाँ एक - दूसरे से भिन्न होते हुए भी कुछ समानताएँ रखती है। 

संगीत के कितने रूप हैं ?
किसी भी कला में , कला के मुख्य दो रूप होते हैं - क्रिया तथा शास्त्र। क्रियात्मक रूप के अंतर्गत उसकी साधना विधि और शास्त्र रूप के अंतर्गत उसका इतिहास तथा पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या आदि आती है। 
( 1 )क्रियात्मक रूप - क्रियात्मक रूप संगीत का वह रूप है , जिसमे हम कानो द्वारा सुनते हैं अथवा नेत्रों दुरा देखते हैं। नाचना , गाना और बजाना क्रियात्मक संगीत के अंतर्गत आते हैं। 
संगीत का प्रयोगिक ( क्रियात्मक पक्ष ) बहुत मत्वपूर्ण होता है। जिसमे आलाप , आलाप ताने , राग आध्जारित विभिन्न गीतों के प्रकार ( सरगम , ख्याल ,लक्षण गीत ) , ताने , गत , मींड , घसीट , झाला , रेला , टुकड़ा आमद ,परन आदि की साधना आती है। 
( 2 ) शास्त्र रूप - शास्त्र रूप में संगीत संबंधी विषयो का अध्ययन करते है इसके दो प्रकार हैं 'क्रियात्मक शास्त्र ' और ' शुद्ध शास्त्र '
( i ) क्रियात्मक शास्त्र - में क्रियात्मक संगीत का अध्ययन  आता है। क्रियात्मक शास्त्र में रागों का परिचय , गीत की स्वर - लिपि लिखना , तान - आलाप , मिलते - जुलते रागों की तुलना , टुकड़ा एवं रेला आदि शामिल हैं।  शास्त्र पक्ष से क्रियात्मक संगीत में बड़ी सहायता मिलती है। 
( ii ) शुद्ध शास्त्र  - के अंतर्गत संगीत , नाद , जाती ,आरोह - अवरोह , स्वर , लय , मात्रा ,ताल खाली आदि की परिभाषा , प्रमुख संगीत शास्त्र एवं संगीत का इतिहास आदि का अध्ययन आता है। 
भारतीय संगीत के प्रकार -

भारतीय संगीत को सामान्यत: 3 भागों में बाँटा जा सकता है:

शास्त्रीय संगीत - इसको मार्ग भी कहते हैं।

उपशास्त्रीय संगीत

सुगम संगीत

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख पद्धतियां हैं -

हिन्दुस्तानी संगीत - जो उत्तर भारत में प्रचलित हुआ।

कर्नाटक संगीत - जो दक्षिण भारत में प्रचलित हुआ।

हिन्दुस्तानी संगीत मुगल बादशाहों की छत्रछाया में विकसित हुआ और कर्नाटक संगीत दक्षिण के मन्दिरों में। इसी कारण दक्षिण भारतीय कृतियों में भक्ति रस अधिक मिलता है और हिन्दुस्तानी संगीत में श्रृंगार रस।
उपशास्त्रीय संगीत में ठुमरी, टप्पा, होरी, कजरी आदि आते हैं।
सुगम संगीत जनसाधारण में प्रचलित है जैसे -
भजन
भारतीय फ़िल्म संगीत
ग़ज़ल
भारतीय पॉप  संगीत
लोक संगीत
संगीत के प्रकार
शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व
शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व
राग परिचय
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समयानुसार गायन प्रस्तुत करने की पद्धति है, तथा उत्तर भारतीय संगीत-पद्धति में रागों के गायन-वादन के विषय में समय का सिध्दांत प्राचीन काल से ही चला आ रहा है, जिसे हमारे प्राचीन पंडितों ने दो भागों में विभाजित किया है। प्रथम भाग दिन के बारह बजे से रात्रि के बारह बजे तक और दूसरा रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक माना गया है। इसमें प्रथम भाग को पूर्व भाग और दुसरे को उत्तर भाग कहा जाता है। इन भागों में जिन रागों का प्रयोग होता है, उन्हें सांगीतिक भाषा में “पूर्वांगवादी राग” और “उत्तरांगवादी राग” भी कहते है। जिन रागों का वादी स्वर जब सप्तक के पूर्वांग अर्थात
संगीत के विभिन्न प्रकार - भारतीय संगीत में संगीत के मुख्यतः दो प्रकार मने गए है। 
 (1) शास्त्रीय संगीत  
 (2) भाव संगीत  संगीत के प्रकार 
   संगीत में मुख्या  दो प्रकार होते है   - 
  (1) शास्त्रीय संगीत
  (2) भाव संगीत। 
  (1) शास्त्रीय संगीत -
आसान भाषा में शास्त्रीय संगीत उसे कहते है जिसमे नियमित शास्त्र  होता जिसमे कुछ विशेष नियमो क पालन करना आवश्यक होता है। 
उदाहरण के लिए हमे शास्त्रीय संगीत के रागो में कुछ विशेष नियमो का पालन करना पड़ता है। 
राग के नियमो का पालन न करने से राग हानि होती है। 
(2) भाव संगीत 
भाव संगीत को लाइट म्यूजिक भी कहते है। 
भाव  संगीत में शास्त्रीय संगीत के सामान न कोई बंधन होता है और न ही की नियमित शास्त्र होता है। 
भाव संगीत का मात्र एक उद्देश्य होता है कानो को अच्छा लगना। 
अतः इसमें कोई बंधन नहीं होता हम चाहे जिस स्वर का प्रयोग करे जिस ताल जिस ले में गए जब अलाप तान ले बस कानो को सुनने में अच्छा लगे। 
भाव संगीत की रंजकता (मधुरता) बढ़ाने के लिए कभ कभी शास्त्रीय संगीत का सहर लिया जाता है। 
भाव संगीत को मुख्यतः तीन  हगो में विभाजित किया जा सकता है 
(1) चित्रपट संगीत  
(2) लोक संगीत  
(3) भजन - गीत   आदि।  
(1) चित्रपट संगीत
फिल्मो में जो गाने प्रयोग किये जाते है उसे हम चित्रपट संगीत कहते है। 
"झनक झनक मोरी बाजे पायलिया" पूर्णतः शास्त्रीय शैली होते हुए भी इसे हम चित्रपट संगीत में गिनते है क्युकी इनका प्रयोग फिल्म में किया गया है.
साधारण फिल्मो के गीतों की कुछ निजी विशेस्ता होती है  जैसे उसमे तरह तरह के वाद्यों का प्रयोग होता है ध्वनि रिकॉर्ड करने से पहले उसको सजाया जाता है। इन्ही करने से साधारण जनता फ़िल्मी गीतों सुन्ना ज्यादा पसंद करते है। 
(2) लोक गीत 
यह मुख्यतः क्षेत्रीय या  ग्रामीणों का गीत है। इन गीतों में सैकड़ो वर्षो से चले आये रीति रिवाजो की झलक मिलती है।  इसके अंतर्गत शादी व विभिन्न संस्कारो में गए जाने बाले गीत  है। 
अधिकतर लोग गीत के साथ ढोलक बजायी जाती है। 
इनके कुछ नाम भी हियते है जैसे - चैती, कजरी, दादरा, इत्यादि। 
(3)भजन गीत आदि 
जिन गीतों में ईश्वर का गुड़ गान या प्रार्थना की जाती उसे हम भजन कहते है। 
जिन कविताओं को स्वर वद्ध तरीके से गया जाता उनको गीत कहते है। 
इन गीतों भी कोई बंधन नहीं होता , अधिकतर ये दादरा कहरवा ताल में होते है। 

यूजीसी नेट संगीत पाठ्यक्रम 2021 हिंदी , UGC NET Sangeet Syllabus 2021 Hindi

 यूजीसी नेट संगीत पाठ्यक्रम 2021 हिंदी

(1) तकनीकी शब्दावली

नाद, श्रुति, स्वर, ग्राम-मूरचना, जाति, राग, ताल, तन, गमक, गंधर्व-गण, मार्ग-देशी, गीति, वर्ण, अलंकार, राग, सद्भाव, संगीत तराजू, संगीत अंतराल, व्यंजन-विसंगति, हार्मोनिक्स, पश्चिमी और दक्षिण भारतीय शब्दावली और उनकी व्याख्याएं निशब्द क्रिया, ठेका, सरल गत, आदि गत, चक्रदार गत, फरमाशी गत और अन्य cvaraities  की विविधताएं, और कायदास, उपांग, भाषानाग, गीता, कृति, कीर्तन, जतिश्वर, पद स्वजति, रागमालिका, तिलना, न्यासा, अम्सा, प्रसा, यति, अनुपसार, आलपना, नर्वल, संगति और तीसरी शर्तें, गीतिनाट्य, नृत्य-नाट्य, बैतालिक, वर्षा-मंगलम, बसंतोत्सव, गीता-बिताना, स्वर-बिटाना, अकर्मणिक अंकन, अकर्मण्य , मासितखानी और राजखानी गती। 

(2) अनुप्रयुक्त सिद्धांत

रागों का विवरण और महत्वपूर्ण अध्ययन, रागों का वर्गीकरण, अर्थात ग्राम राग, वर्गीकरण, मेला राग, वर्गीकरण, राग-रागिनी, वर्गीकरण, थाटा राग वर्गीकरण, और रागंगा वर्गीकरण, रागों का समय सिद्धांत, भारतीय संगीत में माधुर्य और सामंजस्य का अनुप्रयोग, प्राचीन मध्यकालीन और आधुनिक काल में श्रुतियों पर शुद्ध और विकृत स्वरों की नियुक्ति। 

हिन्दुस्तानी संगीत की प्रचलित परम्पराओं का विस्तृत ज्ञान, प्राचीन काल के ताल दशप्राणा और मार्ग और देशी तास का ज्ञान, तिहाई बनाने के मूल सिद्धांत, चक्रदार गत, चक्रदार पारन, हिन्दुस्तानी और कर्नाटक ताल स्यातेम का तुलनात्मक अध्ययन, जिसमें ताल के दस प्राणों का विशेष उल्लेख है। , विभिन्न लेकारियों का विस्तृत अध्ययन जैसे, टिगुन, चौगुन, अदा, कुआड़ा, वियादा विज्ञापन विधि उन्हें रचना में लागू करने के लिए। 

हिंदुस्तानी लत्ता और रागिनी का टैगोर का उपचार, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का तत्व, कर्नाटक संगीत, अन्य प्रांतों का पश्चिमी संगीत, लोक संगीत और बंगाल का कीर्तन और टैगोर के रागों के उपचार पर उनका प्रभाव। 

(3) संरचना के रूप और उनका विकास

प्रबंध, ध्रुपद ख्याल धामर, ठुमरीम, टप्पा, तराना, चतुरंग, त्रिवत, वृंदागना, वृंदा, वडन, जवेली, कृति, तिलना, आलाप, वर्णम (पद वर्णम और ताना वर्णम), पदम, रागम, तनम, पल्लवी, गीता, वर्ण , स्वरजयंती, कल्पिता, संगीता, रागमालिका, नरवल्लु, स्वरा कल्पना, (मनोधर्म संगीत), तेवरम, दिव्यप्रबंधम, तिरुप्पुगज़। 

अरिंद्रा संगीत के मुख्य रूप। 

अकर्मत्रिक अंकन प्रणाली, देवनागरी लिपि का ज्ञान।

बंगाल के संगीत का इतिहास।

(4) घराने और गायकी

हिंदुस्तानी संगीत में घरानों की उत्पत्ति और विकास और पारंपरिक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के संरक्षण और प्रचार में उनका योगदान। घराने की व्यवस्था के गुण और दोष। 

वाद्य संगीत और ताल में घरानों की उत्पत्ति और विकास और भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने में उनका योगदान। घराने की व्यवस्था के गुण और दोष। 

स्वर वाद्य और ताल समूह में विभिन्न घरानों की परंपराओं और विशिष्टताओं का अध्ययन। समकालीन संगीत में घरानों की वांछनीयता और संभावना। 

कर्नाटक संगीत में गुरु शिया परम्परा और गायन और वादन की विभिन्न शैलियाँ। 

रवींद्र नाथ टैगोर की संगीत रचनात्मकता, उनकी अपनी प्रयोगात्मक विविधताओं सहित टैगोर की संगीत रचनाओं की तानवाला और लयबद्ध किस्मों का एक समग्र सर्वेक्षण। टैगोर की संगीत रचना की अवधि और चरण (कालानुक्रमिक क्रम बनाए रखा जा सकता है)। 

टैगोर के परिवार का सांस्कृतिक वातावरण (पथुरीघाट और जोरासांको, कलकत्ता), टैगोर के संगीत की विषयगत विविधता पूजा, स्वदेश, प्रेम, प्रकृति, विचित्र, अनुष्ठनिक) । 

(5) भारतीय संगीत में विद्वानों का योगदान और उनकी पाठ्य परंपरा

नारद, भरत, दत्तिल, मातंग, शारंगदेव, नन्यादेव और अन्य। लोचन, राममात्य, पुदारिक, विट्ठल, सोमनाथ, दामोदर, मिश्र, अहोबल, हृदय नारायण, देवा, व्यंकटमाखी, श्रीनिवास, पं. भातखंडे, पं. वीडी पलुस्कर, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, के.सी.डी. बृहस्पति, डॉ. प्रेमलता शर्मा और अन्य। 

भारत, नाट्यशास्त्र, संगीत समयसर, राधा गोविंद संगीत सर, मदरुल मोसिकी, भारतीय वद्यों का इतिहास, संगीत शास्त्र, भारतीय संगीत में ताल और रूप, अभिनव ताल, मंजरी, भारतीय संगीत वाद जैसे वाद्य यंत्रों में प्राचीन मध्यकालीन और आधुनिक संधियों का अध्ययन और अन्य संधियां, कुडाऊ सिंह, भगवानदास, राजा छत्रपति सिंह, अनोक लाला, अहमदजन थिरकवा, शमता प्रसाद, किशन महाराज और अन्य प्राचीन मध्ययुगीन और आधुनिक काल जैसे ताल वाद्य यंत्रों में वरुइओस विद्वानों का योगदान। 

टैगोर के संगीत नाटक और नृत्य नाटिका जैसे वाल्मीकि, प्रतिभा, कलमीगया, मायर खेला, चित्रांगदा, चांडालिका, श्यामा, और अन्य विभिन्न गीतों से भरे नाटक जैसे प्रायश्चित, विसर्जन, सारदोत्सव, राजा, फाल्गुनी, तसर देश, वसंत आदि। टैगोर; गीताबिटन, भाग में संगीत की रचनात्मकता। I, II, III स्वरबिटन भाग- I-63 संगीत-चचिंता (विश्व-भारती)। 

प्रमुख कर्नाटक विद्वानों, संगीतकारों के विज्ञापन कलाकारों और उनके मध्यकालीन और आधुनिक काल जैसे रामायण, व्यंकटमाखी, त्यागराज, मुट्टू-स्वामी, दीक्षितारा, श्यामा शास्त्री, गोपाल कृष्ण, प्रो. संभामूर्ति, पापनासम शिवन, वसंत कुमारी, सुब्बुलक्ष्मी जैसे कार्यों का योगदान। रामारी, टीएनकृष्णन और अन्य। 

  (6) संगीत का ऐतिहासिक दृष्टिकोण                                                                                                             

प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल में हिंदुस्तानी संगीत (गायन, वाद्य ताल), कर्नाटक संगीत और रवींद्र संगीत के ऐतिहासिक विकास पर एक अध्ययन। 

भारतीय संगीत में पश्चिमी विद्वानों का योगदान। 

(7) सौंदर्यशास्त्र

इसकी उत्पत्ति, अभिव्यक्ति और प्रशंसा: सिद्धांत पीएफ सौंदर्यशास्त्र और भारतीय संगीत से इसका संबंध

रस सिद्धांत और भारतीय संगीत में इसका अनुप्रयोग। 

संगीत सौंदर्यशास्त्र और रस का हिंदुस्तानी संगीत (मुखर, वाद्य और ताल), कर्नाटक संगीत और रवींद्र संगीत से संबंध। 

राग-रागिनी पेंटिंग, ध्यान रागों और अन्य के विशेष संदर्भ में ललित कलाओं का अंतर्संबंध। 

रवींद्र नाथ टैगोर की ग्रंथ सूची। 

(8) वाद्य यंत्र/नृत्य

विभिन्न वाद्ययंत्रों की उत्पत्ति, विकास संरचना और उनके प्रसिद्ध प्रतिपादक हिंदुस्तानी (मुखर, वाद्ययंत्र और ताल), कर्नाटक संगीत और रवींद्र संगीत। तानपुरा और इसके हार्मोनिक्स का महत्व। 

हिंदुस्तानी, कर्नाटक के वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण प्राचीन, मध्ययुगीन और आधुनिक काल में संगीत, रबींद्र संगीत में इस्तेमाल किया जाने वाला लोकप्रिय वाद्य यंत्र। 

भारतीय नृत्य जैसे कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी, कथकली आदि का प्रारंभिक ज्ञान। 

(9) लोक संगीत

भारतीय शास्त्रीय संगीत पर लोक संगीत का प्रभाव, लोक धुनों का रागों में शैलीकरण। 

हिन्दुस्तानी, कर्नाटक और रवींद्र संगीत की लोकप्रिय लोक धुनें और लोकनृत्य, जैसे बासुल, भटियाली, लावणी, गरबा, कजरी, चैती, मांड, भांगड़ा, गिद्दा, झूमर, स्वांग, पंडवानी, अमर-प्रानेर, अमनुश अच्छे प्राण, अमर सोनार बांग्ला, कीर्तनम सरीम राय बेशेम झुमर्म, करकट्टम, कावडी अट्टम, ऐलुप्पटम, मैयंडी, मेलम और अन्य प्रमुख लोक रूप। 

हिंदुस्तानी लोक संगीत, कर्नाटक लोक संगीत या दक्षिण भारतीय लोक संगीत, और बंगाल के रबींद्र लोक संगीत या लोक संगीत के तत्व और उनके अंतर्संबंध के बारे में तत्वों का विश्लेषण। 

भारत के विभिन्न क्षेत्रों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, बंगाल और दक्षिण भारत के लोक संगीत का सामान्य अध्ययन। 

(10)संगीत शिक्षण और अनुसंधान प्रौद्योगिकियां

हिंदुस्तानी कर्नाटक संगीत और रवीन्द्र संगीत के संदर्भ में गुरु शिष्य परम्परा, संगीत संप्रदाय, प्रद्राशिनी और संगीत शिक्षण की वाद्य प्रणालियाँ। 

हिंदुस्तानी, कर्नाटक संगीत और रवींद्र संगीत के संदर्भ में संगीत शिक्षा में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे शिक्षण सहायक उपकरण की उपयोगिता। 

संगीत अनुसंधान की पद्धति, सारांश तैयार करना, डेटा संग्रह, क्षेत्र कार्य लेखन रिपोर्ट, निष्कर्ष ग्रंथ सूची, संदर्भ सामग्री आदि, हिंदुस्तानी, कर्नाटक संगीत और रबींद्र संगीत के संदर्भ में

पाठ्य और मौखिक परंपरा के बीच अंतर्संबंध का अध्ययन। 

यूजीसी नेट संगीत परीक्षा पैटर्न 2021

(1) पेपर I: इसमें यूजीसी नेट शिक्षण और अनुसंधान योग्यता परीक्षा (सामान्य पेपर) से 50 प्रश्न होते हैं, जिन्हें आपको 1 घंटे में हल करना होता है।

(2) पेपर II: यूजीसी संगीत परीक्षा के पेपर में 100 प्रश्न होंगे और कुल अवधि दो घंटे की होगी। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का होता है, इसलिए परीक्षा 200 अंकों की होगी। नेट संगीत परीक्षा (भाग II) का पैटर्न जानने के लिए नीचे पढ़ें।

                      परीक्षा हाइलाइट विवरण

परीक्षण अवधि          -                  120 मिनट

कुल प्रश्न                      -                 100

प्रति प्रश्न अंक             -                    2

कुल अंक                 -                     200

नकारात्मक अंकन           -           N/A

राग कल्याण || RAAG KALYAN NOTES || RAAG YAMAN NOTES || ध्रुपद की लयकारी || श्याम कल्याण || पूरिया कल्याण || शुद्ध कल्याण ||

 


                    राग कल्याण 

सब ही तीवर सुर जहां , वादी गन्धार सुहाय। 

अरु संवादी निखाद तें , ईमन राग कहाय।। 

इसे कल्याण ठाट से उत्पन्न माना गया है। इसलिये यह अपने ठाट का आश्रय राग है। इसमें वादी स्वर गंधार और सम्वादी निषाद है। इसमें मध्यम तीर्व और अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। जाती सम्पूर्ण - सम्पूर्ण है , क्योँकि आरोह - अवरोह में सातों स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसे कुछ प्राचीन ग्रंथों में यमन राग भी कहा गया है , किन्तु यमन - कल्याण कहने से राग बदल जाता है। यमन कल्याण में , जिसे कुछ लोग जैमिनी कल्याण भी कहते हैं , तीर्व मध्यम के साथ दो गान्धारो के बिच में शुद्ध मध्यम का अल्प प्रयोग किया जाता है , जैसे प मं ग म ग रे , ग रे नि रे सा। इसके गाने -बजाने का समय रात्रि का पहला प्रहर है।

आरोह- ऩि रे ग, म॑ प, ध नि सां।

अथवा सा  रे  ग  मं  प ,ध  नि  सां।

 अवरोह- सां नि ध प, म॑ ग रे सा।

 पकड़- ऩि रे ग रे, प रे, ऩि रे सा।

 राग यमन - लक्षणगीत ( तीनताल )



          पार ब्रह्म परमेश्वर '' ध्रुपद की लयकारी 

दुगुन - स्थाई 4 आवृत्ति की है। इसलिये दुगुन सम पारब्रह्म '' से प्रारंभ होगी और पूरी स्थाई की दो आवृत्ति में आवेगी और सम के पूर्व समाप्त होगी। 

तिगुन - स्थाई की तिगुन भी पारब्रह्म अर्थात सम से प्रारम्भ होगी और पूरी स्थायी बोलने के बाद अंतिम पंक्ति यशोदानन्द श्री गोविन्द ' को तीन बार बोलेगें तो सम आवेगा। 

चौगुन - हम ऊपर बता चुके हैं कि स्थाई चार आवृत्ति की है इसलिये पूरी स्थायी को चौगुन में बोलने पर सम आयेगा। 

अंतरा की स्थिति स्थाई के ही समान है , क्योंकि यह भी चार आवृत्ति की है। इसलिये दुगुन , तिगुन  तीनो सम से प्राम्भ होगी और तिगुन में अंतिम लाइन को कुल तीन बार गायेंगे। 

राग यमन कल्याण - चारताल (  ध्रुपद  )

                                                                 स्थायी 



अन्तरा




श्याम कल्याण
राग श्याम कल्याण बडा ही मीठा राग है। यह कल्याण और कामोद अंग (ग म प ग म रे सा) का मिश्रण है।

इस राग को गाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। गंधार आरोह मे वर्ज्य नही है, तब भी ग म् प नि सा' नही लेना चाहिये, बल्कि रे म् प नि सा' लेना चाहिये। गंधार को ग म प ग म रे साइस तरह आरोह में लिया जाता है। सामान्यतः इसका अवरोह सा' नि ध प म१ प ध प ; ग म प ग म रे सा इस तरह से लिया जाता है। अवरोह में कभी कभी निषाद को इस तरह से छोड़ा जाता है जैसे - प सा' सा' रे' सा' नि सा' ध ध प

इस राग का निकटस्थ राग शुद्ध सारंग है, जिसके अवरोह में धैवत को कण स्वर के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, जबकि श्याम कल्याण में धैवत दीर्घ है। इसी प्रकार श्याम कल्याण में गंधार की उपस्थिति इसे शुद्ध सारंग से अलग करती है। इसी तरह, अवरोह में, सा' नि ध प म् ग नही लेना चाहिये, बल्कि सा' नि ध प म् प ध प ; म् प ग म रे सा ऐसे लेना चाहिये। प सा' सा' रे' सा' लेने से राग का माहौल तुरंत बनता है। इसका निकटस्थ राग, राग शुद्ध सारंग है। यह स्वर संगति राग स्वरूप को स्पष्ट करती है -

सा ,नि सा रे म् प ; म् प ध प ; म् प नि सा' ; सा' रे' सा' नि ध प ; म् प ध प ; ग म रे ; ,नि सा रे सा ; प ध प प सा' सा' रे' सा' ; सा' रे' सा' ध प म् प ; रे म् प नि सा' ; नि सा' ध ध प ; सा' नि ध प ; म् प ग म प ; ग म रे ; रे ,नि सा;
थाट
कल्याण
राग जाति
षाडव - सम्पूर्ण
गायन वादन समय
रात्रि का प्रथम प्रहर ४ बजे से ७ बजे तक (संधिप्रकाश)
आरोह अवरोह
,नि सा रे म् प नि सा' - सा' नि ध प म् प ध प ग म प ग म रे सा ; ,नि सा;
वादी स्वर
षड्ज/मध्यम
संवादी स्वर
षड्ज/मध्यम
षाडव - सम्पूर्ण
पूरिया कल्याण
यह राग, यमन और पूरिया धनाश्री या पूरिया से मिल कर बना है। इस राग के अवरोह में, उत्तरांग में कल्याण अंग (सा' नि ध प ; म् ध नि ध प) के पश्चात पूर्वांग में (प म् ग म् रे१ ग रे१ सा) पूरिया धनाश्री अंग अथवा (म् ध ग म् ग ; म् ग रे१ सा) पूरिया अंग लिया जाता है।
राग पूरिया कल्याण में पंचम बहुत महत्वपूर्ण स्वर है। राग यमन की तरह, उत्तरांग में आरोह में पंचम का प्रयोग कम किया जाता है जैसे - म् ध नि सा'। इसी तरह आरोह और अवरोह दोनों में कभी कभी षड्ज को छोड़ा जाता है। आलाप और तानों का प्रारंभ अधिकतर निषाद से किया जाता है। यह स्वर संगतियाँ राग पूरिया कल्याण का रूप दर्शाती हैं -
,नि रे१ ग ; ग म् म् ग ; म् ध प ; म् ध नि ध प ; प म् ध प म् ग ; म् रे१ ग ; रे१ सा ; म् ध म् नि ; नि ध म् ध प ; ध नि सा' नि ध प ; ग म् ध नि सा' नि ; ध नि ध सा' ; नि सा' ; ध नि रे१' सा' ; नि रे१' ग' ; ग' म्' ग'; ग' रे१' सा' ; नि ध नि ध प ; प म् ध प ; म् नि ध म् ग ; म् प म् ग ; प ध म् प म् ग ग रे१ रे१ सा ; ,नि ,ध ,म् ,ध ; ,नि रे१ सा ;
थाट
मारवा
राग जाति
सम्पूर्ण - सम्पूर्ण
गायन वादन समय
रात्रि का प्रथम प्रहर ४ बजे से ७ बजे तक (संधिप्रकाश)
पकड़
निधप म॓ग म॓रे॒ग रे॒सा
आरोह अवरोह
ऩिरे॒ग म॓प धनिसां - सांनिधप म॓गम॓रे॒गरे॒सा
वादी स्वर
सा
संवादी स्वर
शुद्ध कल्याण

राग शुद्ध कल्याण में आरोह में राग भूपाली और अवरोह में राग यमन के स्वर प्रयुक्त होते हैं। इस राग को भूप कल्याण के नाम से भी जाना जाता है परन्तु इसका नाम शुद्ध कल्याण ही ज्यादा प्रचलित है।

अवरोह में आलाप लेते समय, सा' नि ध और प म् ग को मींड में लिया जाता है और निषाद और मध्यम तीव्र पर न्यास नहीं किया जाता। तान लेते समय, अवरोह में निषाद को उन्मुक्त रूप से लिया जाता है पर मध्यम तीव्र को छोड़ा जा सकता है। यह स्वर संगति राग स्वरूप को स्पष्ट करती है -
सा ; ,नि ,ध ; ,नि ,ध ,प ; ,प ,ध सा ; सा ; ग रे सा ; ,ध ,प ग ; रे ग ; सा रे ; सा ,नि ,ध सा ; ग रे ग प रे सा ; सा रे ग प म् ग ; रे ग प ध प ; सा' ध सा' ; सा' नि ध ; प म् ग ; रे ग रे सा ; ग रे ग प रे सा ;
थाट
कल्याण
 राग जाति
औडव - सम्पूर्ण
गायन वादन समय
रात्रि का प्रथम प्रहर ४ बजे से ७ बजे तक (संधिप्रकाश)
पकड़
सारेगपरे गरेगसा
आरोह अवरोह
सारेगपधसां - सांनिधपम॓गरेसा
वादी स्वर
संवादी स्वर









कर्नाटक स्वर - लीपी पद्धति || हिन्दुस्तानी स्वर - लिपि पद्धति || ग्वालियर घराना || जयपुर घराना || Karnataka Swarlipi Padhati || Hindustani Swarilipi Padhat || Question Answer

 

कर्नाटक स्वर - लीपी पद्धति

कर्नाटक स्वर - लिपि पद्धति एवं हिन्दुस्तानी स्वर - लिपि पद्धति को विस्तार से समझाएं। 

Ans -  प्राचीन काल से सम्पूर्ण भारत में संगीत की केवल एक पद्धति थी , किन्तु आज हम देखेते हैं कि अब संगीत की दो पद्धतियां हो गई है। कुछ विद्वानों का मत है की उत्तरी संगीत पर अश्व और फारस की संगीत का प्रभाव पड़ा जिससे उत्तरी संगीत दक्षिणी संगीत से अलग हो गया। उनका कहना है की ग्यारहवीं शताब्दी से भारत में मुसलमानो का आना शुरू हुआ और धीरे - धीरे वे उतर भारत के शासक हो गयें।  अतः उनकी संस्कृति और सभ्यता ने संगीत पर अमिट चाप डाली। दक्षिण भारतय संगीत पर कोई वाद्य प्रभाव नहीं पड़ा। अतः वह का संगीत अपरिवर्तित रहा। इस तरह दोनों संगीत पद्धतियों का मूल आधार एक ही है। निचे दोनों पद्धतियों का विवेचना की जा रही है।  

हिन्दुस्तानी स्वर - लिपि पद्धति - हिदुस्तानि संगीत में स्वर का सब से निचा रूप कोमल होता है।  हिदुस्तानि संगीत में दस थाट माने जाते हैं। हिदुस्तानि संगीत में स्वर की गंभीरता और विभिन्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। 

कर्नाटक स्वर - लीपी पद्धति - कर्नाटक संगीत में स्वर का सब से नीचा रूप शुद्ध कहलाता है। कर्नाटक संगीत में स्वर की कम्पन और चंचलता  पर विशेष ध्यान दिया जाता है कर्नाटक संगीत में उन्नीस थाट माने जाते हैं। 

कर्नाटक संगीत

में दक्षिण भारतीय भाषाओं , संगीत की एक प्रणाली सामान्यतः के साथ जुड़े है दक्षिण भारत के आधुनिक भारतीय राज्यों सहित कर्नाटक , आंध्र प्रदेश , तेलंगाना , केरल और तमिलनाडु , और श्रीलंका यह भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो मुख्य उप-शैलियों में से एक है जो प्राचीन सनातन धर्म विज्ञान और परंपराओं, विशेष रूप से सामवेद से विकसित हुई है । अन्य उप- शैली हिंदुस्तानी संगीत है , जो उत्तरी भारत से फारसी या इस्लामी प्रभावों के कारण एक विशिष्ट रूप के रूप में उभरा । कर्नाटक संगीत में मुख्य जोर मुखर संगीत पर है; अधिकांश रचनाएँ गाने के लिए लिखी जाती हैं, और यहाँ तक कि जब वाद्ययंत्रों पर बजाया जाता है, तो वे गायकी (गायन) शैली में प्रदर्शन करने के लिए होती हैं। हेप्टाटोनिक पैमाने के पश्चिमी संगीत के अंकन , कर्नाटक संगीत में अपनी मूल कहा जाता है कि द्वारा उठाया गया है पाइथागोरस के लिए अपनी यात्रा के दौरान भारत गणित सीखने के लिए, इस प्रकार पश्चिम में यह शुरू। बटा पांच के चक्र और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में कई अन्य लोकप्रिय अवधारणाओं कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के सिद्धांत में अपने मूल है।

हालांकि शैलीगत अंतर हैं, श्रुति (सापेक्ष संगीतमय पिच), स्वर (एक स्वर की संगीत ध्वनि), राग (मोड या मेलोडिक फॉर्मूले), और ताल (लयबद्ध चक्र) के मूल तत्व आशुरचना की नींव बनाते हैं। और कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत दोनों में रचना। यद्यपि आशुरचना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, कर्नाटक संगीत मुख्य रूप से रचनाओं के माध्यम से गाया जाता है, विशेष रूप से कृति (या कीर्तनम) - 14 वीं और 20 वीं शताब्दी के बीच पुरंदर दास और कर्नाटक संगीत की ट्रिनिटी जैसे संगीतकारों द्वारा विकसित एक रूप । कर्नाटक संगीत भी आमतौर पर रचनाओं के माध्यम से सिखाया और सीखा जाता है। कर्नाटक संगीत के विकास में तेलुगु , कन्नड़ और तमिल प्रमुख हैं क्योंकि अधिकांश रचनाएँ तेलुगु, कन्नड़, तमिल या संस्कृत में हैं ।

कर्नाटक संगीत आमतौर पर संगीतकारों के एक छोटे समूह द्वारा किया जाता है, जिसमें एक प्रमुख कलाकार (आमतौर पर एक गायक), एक मधुर संगत (आमतौर पर एक वायलिन ), एक ताल संगत (आमतौर पर एक मृदंगम ), और एक तंबूरा होता है , जो एक ड्रोन के रूप में कार्य करता है। पूरे प्रदर्शन के दौरान। अन्य विशिष्ट प्रदर्शन में इस्तेमाल शामिल हो सकते हैं उपकरणों घातम , कंजीरा , मोर्सिंग , वेणु बांसुरी, वीणा , और चित्रवीना। कर्नाटक संगीतकारों की सबसे बड़ी एकाग्रता चेन्नई शहर में पाई जाती है ।  पूरे भारत और विदेशों में विभिन्न कर्नाटक संगीत समारोह आयोजित किए जाते हैं, जिसमें मद्रास संगीत सत्र भी शामिल है , जिसे दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों में से एक माना जाता है। 

उत्पत्ति, स्रोत और इतिहास

सभी कला रूपों की तरह भारतीय संस्कृति , भारतीय शास्त्रीय संगीत एक दिव्य कला रूप है जो से उत्पन्न होने का विश्वास है देवास और देवी ( हिन्दू देवी देवताओं), और का प्रतीक के रूप में सम्मानित किया गया है नाडा ब्राह्मण । प्राचीन ग्रंथों में स्वरों की उत्पत्ति या स्वरों की उत्पत्ति के संबंध का वर्णन जानवरों और पक्षियों की आवाज़ों से किया गया है और अवलोकन और धारणा की गहरी भावना के माध्यम से इन ध्वनियों को अनुकरण करने के लिए मनुष्य के प्रयास का भी वर्णन किया गया है । समा वेद , जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए नींव रखी माना जाता है कि, से भजन के होते हैं ऋग्वेद , संगीत धुनों जो वैदिक के दौरान तीन से सात संगीत नोट का उपयोग कर गाया किया जाएगा करने के लिए सेट यज्ञ । यजुर-वेद , जो मुख्य रूप से बलि सूत्रों के होते हैं, का उल्लेख है वीणा मुखर पाठ करने के लिए एक संगत के रूप में। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों सहित कई प्राचीन ग्रंथों में भारतीय शास्त्रीय संगीत का उल्लेख मिलता है । याज्ञवल्क्य स्मृति का उल्लेख है वीणावादन तत्त्वज्ञः श्रुतीजातिविशारदः ताळज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति ( , "एक है जो अच्छी तरह से वाकिफ है वीणा , एक है जो श्रुति और एक का ज्ञान जो ताल में माहिर है, पा लेता है मुक्ति ( मोक्ष ) शक के बिना ")। कर्नाटक संगीत के रूप में यह आज है आधारित है संगीत अवधारणाओं (सहित पर स्वर  , राग , और ताल ) कि विस्तार से कई प्राचीन काम करता है, विशेष रूप से में वर्णित किया गया भरत के नाट्य शास्त्र और सिलप्पाधिकारम द्वारा इलांगो अडिगल ।

12वीं शताब्दी के बाद से उत्तर भारत में फ़ारसी और इस्लामी प्रभावों के कारण , भारतीय शास्त्रीय संगीत दो अलग-अलग शैलियों में बदल गया - हिंदुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत।  भाष्य और अन्य रचनाएँ, जैसे कि शारंगदेव की संगीता रत्नाकर , भारतीय शास्त्रीय संगीत में पाई जाने वाली संगीत अवधारणाओं पर और विस्तार से बताती हैं ।  16वीं और 17वीं शताब्दी तक, कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत के बीच एक स्पष्ट सीमांकन था; कर्नाटक संगीत फारसी और अरबी प्रभावों से अपेक्षाकृत अप्रभावित रहा। यह इस समय था कि विजयनगर में कर्नाटक संगीत का विकास हुआ , जबकि विजयनगर साम्राज्य अपने चरम पर पहुंच गया। पुरंदर दास , जिन्हें " कर्नाटक संगीत के पिता ( पितामह ) " के रूप में जाना जाता है , ने उस प्रणाली को तैयार किया जो आमतौर पर कर्नाटक संगीत के शिक्षण के लिए उपयोग की जाती है। वेंकटमाखिन का आविष्कार किया और के लिए सूत्र लेखक मेलकर्ता को संस्कृत काम करते हैं, राग वर्गीकरण की प्रणाली चतुर्दंडी प्रकाशिक

(1660 ई)।  गोविंदाचार्य मेलकार्ता प्रणाली को संपूर्ण राग योजना में विस्तारित करने के लिए जाने जाते हैं - वह प्रणाली जो आज आम उपयोग में है।

इतिहास

क्या आप जानते हैं हिंदुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत में क्या अंतर हैं?

सुव्यवस्थित ध्वनि, जो रस की सृष्टि करे, संगीत कहलाती है। गायन, वादन व नृत्य ये तीनों ही संगीत हैं।हाल में, पॉप, जैज आदि जैसे संगीत के नये रूपों के साथ शास्त्रीय विराशत का फ्यूज़न करने की ओर रुझान बढ़ा रहा है और लोगो का ध्यान भी आकर्षित कर रहा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को दो प्रकार से बाटा गया है- हिंदुस्तानी शैली और कर्नाटक शैली। इस लेख में हमने, हिंदुस्तान संगीत और कर्नाटक संगीत के बारे में बताया है। 

सुव्यवस्थित ध्वनि, जो रस की सृष्टि करे, संगीत कहलाती है। गायन, वादन व नृत्य ये तीनों ही संगीत हैं। भारतीय उप-महाद्वीप में प्रचलित संगीत  के कई प्रकार हैं। ये विभिन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं, कुछ का झुकाव शास्त्रीय संगीत की ओर है तथा कुछ का प्रयोग वैश्विक संगीत के साथ भी किया जाता है। हाल में, पॉप, जैज आदि जैसे संगीत के नये रूपों के साथ शास्त्रीय विराशत का फ्यूज़न करने की ओर रुझान बढ़ा रहा है और लोगो का ध्यान भी आकर्षित कर रहा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को  दो प्रकार से बाटा गया है- हिंदुस्तानी शैली और कर्नाटक शैली।

हिंदुस्तानी संगीत शैली (हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत)

यह भारतीय शास्त्रीय संगीत के दो प्रमुख शैली में से एक है। इस शैली में संगीत संरचना और उसमें तत्वकालिकता की संभावनाओं पर अधीक केन्द्रित होती है। इस शैली में “शुद्ध स्वर सप्तक या प्राकृतिक स्वरों के सप्तक” के पैमाने को अपनाया गया है। 11वीं और 12वीं शताब्दी में मुस्लिम सभ्यता के प्रसार ने भारतीय संगीत की दिशा को नया आयाम दिया। "मध्यकालीन मुसलमान गायकों और नायकों ने भारतीय संस्कारों को बनाए रखा। " ध्रुपद, धमर, होरी, ख्याल, टप्पा, चतुरंग, रससागर, तराना, सरगम और ठुमरी” जैसी हिंदुस्तानी संगीत शैली में गायन की दस मुख्य शैलियाँ हैं। ध्रुपद को हिंदुस्तान शास्त्रीय संगीत का सबसे पुराना गायन शैली माना जाता है, जिसके निर्माता स्वामी हरिदास को माना जाता है।

हिंदुस्तानी संगीत शैली की विशेषताएं

(1)  गीत के नैतिक निर्माण (नदी और सांवादी स्वर) पर जोर दिया जाता है।

(2) गायक तेजी से ताली के साथ गायन करता है, जिसे 'जोदा' कहा जाता है।

(3) पूर्ण स्वरों को पूरा माना जाता है जब विकृत स्वर के साथ गायन होता है।

(4) शुद्ध स्वरों की ठाट को 'तिलवाल' कहा जाता है।

(5) स्वरों में रेंज और लचीलापन होता है।

(6) समय सीमा का पालन किया जाता है। सुबह और शाम के लिए अलग-अलग राग होता हैं।

(7) ताल सामान्य होता हैं।

(8) राग लिंग भिन्नता पर आधारित होता हैं।

(9) इसके प्रमुख 6 राग हैं।

कर्नाटक संगीत शैली

यह शैली उस संगीत का सृजन करती है जिसे परम्परिक सप्तक में बनाया जाता है। यह भारत के शास्त्रीय संगीत की दक्षिण भारतीय शैली का नाम है, जो उत्तरी भारत की शैली हिन्दुस्तानी संगीत से काफी अलग है। इस शैली में ज्यादातर भक्ति संगीत के रूप में होता है और ज्यादातर रचनाएँ हिन्दू देवी देवताओं को संबोधित होता है। इसके अलावा कुछ हिस्सा प्रेम और अन्य सामाजिक मुद्दों को भी समर्पित होता है।

इस शैली के संगीत में कई तरह के घटक हैं- जैसे मध्यम और तीव्र गति से ढोलकिया के साथ प्रदर्शन किय जाने वाला तत्वकालिक अनुभाग स्वर-कल्पना। इस शैली में सामान्यतः मृद्गम के साथ गया जाता है। मृद्गम के साथ मुक्त लय में मधुर तत्वकालिक का खण्ड ‘थानम’ कहलाता है। लेकिन वे खंड जिनमें मृद्गम की आवश्यकता नहीं होती है उन्हें ‘रागम’ बोला जाता है।

त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितार और श्यामा शास्त्री को कर्नाटक संगीत शैली की 'त्रिमूर्ति' कहा जाता है, जबकि पुरंदर दास को अक्सर कर्नाटक शैली का पिता कहा जाता है। इस शैली के विषयों में पूजा-अर्चना, मंदिरों का वर्णन, दार्शनिक चिंतन, नायक-नायिका वर्णन और देशभक्ति भी शामिल हैं। वर्णम, जावाली और तिल्लाना इस संगीत शैली के गायन शैली के प्रमुख रूप हैं।

कर्नाटक संगीत शैली की विशेषताएं

(1) इस शैली में ध्वनि की तीव्रता नियंत्रित की जाती है।

(2) हेलीकल (कुंडली) स्वरों का उपयोग किया जाता है।

(3) कंठ संगीत पर ज्यादा बल दिया जाता है।

(4) इस शैली में 72 प्रकार के राग होता है।

(5) तत्वकालिकता के लिए कोई स्वतंत्रता नहीं होती है और गायन शैली की केवल एक विशेष निर्धारित शैली होती है। 

(6) स्वरों की शुद्धता, श्रुतियों से ज्यादा उच्च शुद्धता पर आधारित होती है।

(7) शुद्ध स्वरों की ठाट को 'मुखरी' कहा जाता है।

(8) समय अवधि कर्नाटक संगीत में अच्छी तरह से परिभाषित हैं। मध्य 'विलाम्बा' से दो बार और 'ध्रुता' मध्य में से दो बार है।

Q भारतीय संगीत में घरानों का महत्व को समझाते हुए संगीत के किन्ही दो प्रशिद्ध घरानों का पूर्ण व्याख्या करें। 

Ans -प्राचीन भारतीय गायको में कुछ ऐसे प्रशिद्ध गायक हो गए जिन्होंने अपनी प्रतिभा से एक विशेष प्रकार की गायन शैली को जन्म देकर उसे अपनी पुत्रो तथा शिष्यों को शिखाकर प्रचलित किया। उनकी उस शैली का अनुकरण उनके शिष्यगण तथा कुदुम्बी अब तक करते चले आ रहें हैं उन गायन शैली को ही घराने का नाम दिया जाता है। घरानो के राग स्वर तो प्रायः एक से ही है किन्तु उनके गाने का या स्वरों को प्रयुक्त करने का ढंग अलग - अलग होने के कारण यह कहा जाता है यह अमुख घराने की गायकी है। 

ग्वालियर घराना - इस घराने के जन्मदाता प्रसिद्ध सगीतज्ञ हद्दू खाँ। हस्सू खाँ के दादा स्वः नत्थन पिरवहर माने जाते है। नत्थू खाँ कादिरबख्श के पुत्र थे किन्तु ये अपने चाचा पीरवख्श की गोद थे। (गोद लिये थे ) हस्सू खाँ , हद्दू खाँ तथा नत्थू खाँ ये तीनो भाई प्रसिद्ध ख़याल गायक तथा ग्वालियर के दरवारी गायक थे। 

जोरदार तथा खूली आवाज का गायक ग्वालियर घराने की गायकी की विशेषताए थी।  ध्रुपद अंग के ख्याल , शिधि तथा सपाट ताने , लोलतानों में लयकारी , गमको का प्रयोग करना अच्छी तरह जानते थे। 

जयपुर घराना - आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व मोहम्म्द अली खाँ ने जयपुर घराना को जन्म दिया था। कुछ लोगों का विचार है कि  इस घराने के प्रवर्तक मनरंग थे। मुहम्मद अली खाँ इनके वंशज माने जाते जैन। इनके पुत्र प्रसिद्ध संगीतज्ञ आशिक अली खाँ थे। आशिक अली खाँ पहले गाना गाते थे किन्तु बाद में सितार बजाने लगे। इनके शिष्यों में जी ० एन ० गोस्वामी , मुश्ताक अली , अनवरी बेगम रसूलन बाई प्रमुख हैं। 



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राग रागिनी वर्गीकरण को विस्तार से समझाए ? || RAAG - RAAGINI KO VISTAAR SE SAMJHAAYEN || CLASSICAL MUSIC || राग-रागिनी पद्दति ||


Q - राग - रागिनी वर्गीकरण को विस्तार से समझाए ?

Ans-राग - रागिनी वर्गीकरण -  मध्यकाल की यह विशेषता थी की कुछ रागों को स्त्री और कुछ को पुरुष मानकर के रागों की वंश - परम्परा मानी गई। इसी विचारधा के आधार पर राग - रागिनी पद्धति का जन्म हुआ। इसमें मतैक्य न रहा और मुख्य चार मत हो गए। प्रथम दो मतानुसार प्रत्येक राग की 6 - 6  तथा अंतिम दो मतानुसार प्रत्येक की 5- 5   रागिनियाँ मानी जाती थी। इन रागों के 8 -8  पुत्र चारों मतों द्वारा मान्य थे। इस प्रकार प्रथम दो मतानुसार 6 राग व 36 रागिनियाँ और अंतिम दो मतानुसार 6 राग व 30 रागिनियाँ मानी जाती थी।  चारों मतों का विवरण इस प्रकार है -

(1) शिव अथवा सोमेश्वर मत - इस मतानुसार 6 राग श्री ,बसंत , पंचम , भैरव , मेघ व नट नारायण माने जातें थे और प्रत्येक राग की 6 -6 रागिनियाँ मानी जाती थी। उसके बाद पत्र

(2) कृष्ण अथवा कल्लिनाथ मत - इस मत के 6 राग प्रथम मत के ही समान थे , किन्तु उनकी 6 रागिनियाँ उनके पुत्र - वधुये शिव मत से भिन्न थी। 

(3) भरत मत - इस मतानुसार भैरव , मालकोश , हिंडोल , दीपक ,श्री और मेघ राग , प्रत्येक की 5 -5 रागिनियाँ 8 - 8 पुत्रऔर पुत्र - वधुये मानी जाती थी। 

(4) हनुमान मत - इसके 6  राग भरत मत के सामान थे। प्रत्येक की 5 - 5 रागिनियाँ और 8 - 8 पुत्र माने गए जो भरत से भिन्न थे 

* शिव मत के 6 राग और 36  रागिनियाँ -

(1) श्री - मालश्री , त्रिवेणी , गौरी ,केदार मधुमाधवी ,पहाडिका । 

(2) बसंत - देशी , देवगिरि , वराटी , तोड़िका , ललिता , हिंदोली। 

(3) भैरव - भैरव , गुजरी , रामकली , गुनकिरी , बंगाली ,रोधवी। 

(4) पंचम - विभाषा , भूपाली , कर्णाटि , नड़हंसिका , पालवी , पटमज । 

(5) वृहन्नाट - कामोदी , कल्याणी , अमरी , नाटिका सारंगी , नट्टहम्बीरा। 

(6) मेघ - मल्लारी , सोरठी , सावेरी , कोशिकी , गांधरी हरशृंगार।

* कृष्ण मत के 6 राग और 36 रागिनियाँ -

(1) श्री - गौरी , कोलाहल ,धवल , वरोजाति , मालकोश , देवगांधार। 

(2) बसंत - अधाली , गुणकारी , पटमंजरी , गौरगिरि , धाकि। 

(3)भैरव - भैरवी , गुर्जरी , बिलावली बिहाग , कर्नाट , कानड़ा। 

(4)पंचम - त्रिवेणी , हस्ततरेतहा , अधिरि , कोकभ , बरारी , आसावरी। 

(5) नटनारायण - तिबंकि , त्रिलंगी , पूर्वी , गांधारी , रामा , सिंधु मल्लारी। 

(6) मेघ - बंगाली , मधुरा , कामोद , धनाश्री , देवतीर्थी , दिवाली। 

* भरत मत के 6 राग व  30 रागिनियाँ - 

(1) भैरव - मधुमाधवी , ललिता , बरोरी , भैरवी , बहुली। 

(2) मालकोश - गुर्जरी , विद्यावती , तोड़ी , खम्बावती , ककुभ। 

(3) हिंडोल - रामकली , मालवी , आसावरी , देवरी , केकी। 

(4)दीपक - केदारी , गौरी , दावती , कामोद , गुर्जरी। 

(5)श्री - सैंधवी , काफी , ठुमरी , विचित्रा , सोहनी। 

(6) मेघ - मल्लारी , सारंग देशी रतिवल्लभ ,कानरा। 

* हनुमान मत के 6  राग व 30 रागिनियाँ -

(1) भैरवी - मध्यमादि , भैरवी , बंगाली , बराटिका , सैधवी। 

(2) कौशिका - तोड़ी , खम्बावती , गौरी , गुणर्की , ककुभा। 

(3)हिडोल - बेलावली , रामकिरी , देशाट्या , पखमंजरी , ललिता 

(4)दीपक - केदारी , कानड़ा , देशी , कामोद , नाटिका। 

(5) श्री - बासंती , मालवी , मालश्री , धनासिका , आसावरी। 

(6)मेघ - मल्लारी , देशकारी , भूपाली , गुर्जरी , टंका। 

कौशिका का आधुनिक नाम मालकोश है।                                                                                                       

इसप्रकार राग - रागिनियाँ की वषावली चल पड़ी। उपर्युक्त चारों मतों में श्री , भैरव तथा हिंडोल इन तीनो रागों को मुख्य 6 रागों में तो सम्मिलित किया गया किन्तु आगे चलकर किन्ही भी दो वर्गीकरणों में समता नहीं रही। आज यह बताना बड़ा ही मुश्किल है की रा - रागिनी पद्धति में स्वर - मांय , स्वरुप - साम्य अथवा दोनों का ध्यान रखा गया था क्योकि मध्यकालीन राग - रागिनियाँ आधुनिक रागों से भिन्न थी। 

 राग-रागिनी पद्दति

पशु पक्षियों जैसा ही, मनुष्यों के पास भी शुरुआत में सिर्फ बोली थी, कोई भाषा नहीं थी। धीरे धीरे सभ्यता के विकास के साथ शब्दों के स्वरुप तय हुए, व्याकरण तैयार हुआ और अलग अलग सभ्यताओं के लिए अलग अलग भाषाएँ बनी।

अभी के भारत की संस्कृति ही देख लें तो कई भाषाओँ के साथ साथ कई बोलियाँ भी मिल जायेंगी। जैसे ये भाषा के साथ होता है, वैसे ही ये संगीत के लिए भी होता है। एक सरगम और संगीत के एक प्रारूप के तय होने के साथ ही लोकगीतों से अलग, भारतीय शास्त्रीय संगीत का उदय हुआ

भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भी भेद होता है, राग कम हैं और रागिनियाँ अधिक। रागों के लिए भाव भी होते हैं, परिवार भारत में महत्वपूर्ण इकाई है, इसलिए हर राग का परिवार भी होता है।

धर्म से भारतीय संस्कृति के जुड़े होने के कारण हर राग, नटनागर यानि भगवान शिव से भी जुड़ा है। पांच राग भगवन शिव के पांच मुख से निकले बताये जाते हैं।

उन्नीसवीं सदी के शुरुआत तक यही राग-रागिनी पद्दति भारतीय शास्त्रीय संगीत के वर्गीकरण के लिए इस्तेमाल होती थी।

सुबह की शुरुआत का राग भैरव (भूमि तत्व), हिंडोल (आकाश तत्व), दीपक (अग्नि तत्व), श्री (वायु तत्व) और मेघ (जल तत्व) शिव के हैं और छठा मालकौंस राग पार्वती का है।

ऐसे चार मत होते थे, जिनमें से ये भरत मत के रागों के नाम हैं। भरत मत में हरेक राग की पांच पांच रागिनियाँ, आठ पुत्र राग और आठ वधु मानी जाती थी। हनुमत मत में भी रागों के नाम यही थे। रागिनियों, पुत्र रागों इत्यादि की गिनती बदलती थी। शिव मत के अनुसार भी छः राग माने जाते थे।

प्रत्येक की छः-छः रागिनियाँ तथा आठ पुत्र मानते थे। इस मत में राग भैरव, राग श्री, राग मेघ, राग बसंत, राग पंचम, और राग नट नारायण होते थे।

सन 1810-20 के बीच इस पद्दति की आलोचना शुरू हुई और सुधार की जरूरत महसूस की जाने लगी। ये काम पचास साल बाद शुरू होना था।

पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म ही 1860 में हुआ (देहावसान-1936)। अधिकांश उत्तर भारत में जो आधुनिक थाट पद्दति आज जानी जाती है, उसके जन्मदाता पंडित भातखंडे थे। उन्होंने 1640 के आस पास के कर्णाटक शैली के विद्वान पंडित वेंकटमखिन की शैली के आधार पर वर्गीकरण का प्रयास शुरू किया

बरसों की मेहनत से वो दस प्रमुख थाट में भारतीय शास्त्रीय संगीत को बाँट पाए। बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावारी, भैरवी और तोडी थाट में आज संगीत बांटा जा सकता है। जैसे मालकौंस को भैरवी थाट में डाल सकते हैं, राग श्री को पूर्वी थाट में डालेंगे।

थाट को परिवार के उपनाम की तरह समझिये। जैसे किसी के घर शादी का कार्ड देने आया कोई व्यक्ति पारिवारिक उपनाम से फलां परिवार को सादर आमंत्रण लिखकर छोड़ सकता है। उस आमंत्रण के उपनाम से कई लोग पहचाने जाते हैं इसलिए परिवार के कई लोगों में से एक या कुछ व्यक्ति चले जायेंगे।

थाट का बनना गणित पर आधारित है। सरगम के सात स्वरों में से पांच को विकृति दी जा सकती है, यानि कोमल और तीव्र स्वर भी होते हैं। इस तरह कुल सात शुद्ध स्वर और पांच विकृत, बारह स्वर होते हैं।

अब अगर पर्मुटेशन-कॉम्बिनेशन इस्तेमाल करें और सा, पा को केवल शुद्ध स्वर, और रे, गा, म, धा, और नी का एक (कोमल या तीव्र) रूप इस्तेमाल करें तो कुल 32 स्वरुप बनेंगे। अपनी तलाश में पंडित भातखंडे को जो दस थाट प्रबल दिखे, उन्होंने उसमें ही सबको बांटा।

ये जो ज्यादातर थाट हैं, इनसे मिलते जुलते से पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के चर्च मॉड भी मिल जाते हैं। एक अंतर ये कहा जा सकता है कि हाई ऑक्टेव पिच के लिए चर्च बच्चों का बंध्याकरण करके उनसे गवाता था। ऐसे एक गाने लायक किन्नर बच्चे के बंध्याकरण में कई बच्चों की मौत भी हो जाती थी

बाद में ये वहशी हरकत ख़त्म हुई तो ऑपेरा के कई हिस्से ही दोबारा तैयार करने पड़े। जो पुरानी पद्दति थी उसे गाने लायक बचपन से बंध्याकरण करके बच्चों को आज तैयार नहीं किया जा सकता। खुशकिस्मती से भारतीय परम्पराओं में ऐसी अमानवीयता नहीं होती, इसलिए रागों को गायब नहीं करना पड़ा।

ये जरूर है कि एक ही व्यक्ति का इतने वृहदाकार संगीत शास्त्र पर काम पूर्ण हो, ऐसा थोड़ा कठिन है। इस वजह से पंडित भातखंडे का वर्गीकरण भी पूरा नहीं माना जाता। दस थाटों में उनके वर्गीकरण पर आगे क्या प्रयास हुए, उन प्रयासों को कितनी सफलता मिली ये भी बहस का मुद्दा हो जाता है।

अब आप अगर यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो देखिये कि जो बात संगीत पर होनी थी वो धर्म से शुरू होकर गणित तक पहुँच गई। इतने पे भी स्थिति ये है कि हम ये बताने की कोशिश करें कि राग हिंडोल मारवा थाट का है, या कल्याण थाट का, तो एक बड़ी बहस खड़ी हो सकती है।

तो आप ये भी समझ सकते हैं कि माला की तरह, धर्म से होते हुए, संगीत को जोड़ते जो गणित तक पहुंचा है, वो सबको जोड़ता धागा ही संस्कृति है। हरेक हिस्से की अपनी महत्ता है, साथ आये तो और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

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संगीत एवं मनोविज्ञान || SANGEET EVAM MANOVIGYAN || BHARTIYA SANGEET EVAM MANOVIGYAN || CLASSICAL MUSIC ||

संगीत एवं मनोविज्ञान 

 * इन दोनों विषयों का सह - सम्बन्ध मुख्य रूप से सुन्ना व ध्वनि अभिव्यक्ति से है। सभी कलाओं में संगीत कला मनुष्य की अंतरिक प्रकृति , भावनाओं एवं विचारों को अपेक्षाकृत्त अधिक प्रभावित करती है।  राग व उसमे निबध्द रचनाएँ अद्भुत सौंदर्यात्मक इकाइयाँ हैं, जो मनुष्य के संवेगों पर प्रभाव डालती हैं। राग एवं उसमे परिलक्षित रस का अध्ययन ही हमें मनोविज्ञान के क्षेत्र में ले जाता है। 

* जनसामान्य व्यक्ति सांगीतिक ध्वनियों को सुनकर अपनी भावनाओं को उतार - चढ़ाव के साथ ही अभिव्यक्त करता है।  अतः संगीत मानव संवेगों को इतना हिला देता है कि  मनुष्य विभिन्न रंगों व रूपों में उनका सफलतापूर्वक प्रस्तुतीकरण कर सकता हैं। 

संगीत एवं दर्शनशास्त्र 

* किसी भी जाती या राष्टय की प्रगति के मापक साधकों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन दर्शनशास्त्र है।  जो राष्ट जितना अधिक चिंतनशील होगा , वह राष्ट्र उतना ही प्रगतिशील होगा। 

* दर्शन का शाब्दिक अर्थ है देखने वाला या देखने सेक्स पता चलने वाला। इसी जिज्ञासा में दर्शन की उत्पत्ति मानी जाती है।  इसका मूल अर्थ है - साक्षात अनुभव अर्थात साक्षात अनुभव व देखकर जिसके बारे में जाना जाए। 

*उपनिषदोंव अन्य ग्रंथों में आत्मा को दर्शन का विषय माना गया है।  सरशनशास्त्र तीन मूल तत्वों पर आधारित है   - जिव कौन है , जगत क्या है एवं इसका रचियता कौन है ?

* ऐसे सभी प्रश्नो की जिज्ञासा के समाधान हेतु मनीषियों ने विभिन्न मार्गों का अन्वेषण किया और विभिन्न सिद्धांत स्थापित किए। इस सिद्धांत को हि दर्शन व उसकी  विभिन्न शाखाओं के नाम से जाना जाता है। 

प्रमुखतः भारतीय दर्शन दो भागो में विभक्त है 

1.आस्तिक दर्शन - जिस व्यक्ति का ईश्वर में विश्वास होता है , उसे आस्तिक कहते हैं और आस्तिक दर्शन के अंतर्गत आते हैं। 

2.नास्तिक दर्शन - जो वेदों  की निंदा करते हैं , वे नास्तिक कहलाते हैं और नास्तिक दर्शन के अंतर्गत आते हैं।  चार्वाक दर्शन , जैन दर्शन व बौद्ध दर्शन वेदों को नहीं मानते , इसलिए ये नास्तिक दर्शन के अंतर्गत आते हैं। 

* भारत साधन सम्पन्न अध्यात्म प्रधान देश रहा है।  यहाँ के मनीषियों का ध्यान स्वतः परब्रह्य की प्राप्ति या मोक्ष प्राप्ति का मुख्य माध्यम रहा।  हमारी विभिन्न धार्मिक परम्पराओं और ज्ञान ग्रंथों ( दार्शनिक ग्रंथों ) जैसे - वेदो उपनिषद स्मृति सूत्र पारलौकिक , संगीत सदैव भक्ति भावना से परिपूर्ण रहा है। 

* भारतीय परम्परा को आधारभूत ग्रन्थ वेद है , जो संगीत पर आधारित है। सामवेद तो पूर्णतया संगीतमय है।  सामगान को परमकल्याण का साधक होने के कारण मोक्ष प्राप्ति  कराने वाला कहा है। वैदिक काल के ग्रंथों में ज्ञान के अतिरिक्त योग ,धर्म शक्ति आदि की भी जानकारी मिलती है। 

* तैत्तरीय उपनिषद में संगीत से अद्भुत इसकी विशुद्ध आनंदमय अनुभूति होती है तथा संगीत को ब्रम्हानंद का सहोदर बताया है।  श्रीमद्भगवतगीता को तो भातीय दर्शन का साररुप कहा है।  इसमें ब्रह्मा के सगुन - निरगुण  दोनों ही रूपों का वर्णन है।  इसमें श्री कृष्ण की ब्रम्ह प्राप्ति के लिए संगीत का ज्ञान महत्वपूर्ण है।  दर्शन में शिव व शक्ति के संयोग के परिणाम से ही सृष्टि की रचना बताई है। दर्शन में संगीत आधारित माद और लय का भी पर्याप्त महत्व हहि।  भारत के नाट्यशास्त्र में भी जप तप आदि की अपेक्षा संगीत को परमार्थ प्राप्ति का सहायक कहा है।  शास्त्रों में आहत और अनाहत नाद , जो संगीत है उसे दर्शन का तत्त्व बताया है। 

* अतः सांसारिक जीवों से मुक्ति  पाने , परम् तत्त्व की अनुभूति करने ( अर्थात मोक्ष प्राप्ति ) त्रिविध तपों से सतत जीवों को शान्ति प्राप्त कराना जो संगीत व दर्शनशास्त्र के परस्पर सहयोग से ही प्राप्त हो सकती है ,इसलिए संगीत व दर्शन का भी अटूट सम्बन्ध है। 


संगीत योग्यता
संगीत योग्यता एक व्यक्ति की संगीत गतिविधि के लिए आवश्यक कौशल और ज्ञान प्राप्त करने की जन्मजात क्षमता को संदर्भित करती है, और उस गति को प्रभावित कर सकती है जिस पर सीखना हो सकता है और उस स्तर को प्राप्त किया जा सकता है। इस क्षेत्र में अध्ययन इस बात पर केंद्रित है कि क्या योग्यता को सबसेट में तोड़ा जा सकता है या एक ही निर्माण के रूप में दर्शाया जा सकता है, क्या योग्यता को महत्वपूर्ण उपलब्धि से पहले मापा जा सकता है, क्या उच्च योग्यता उपलब्धि की भविष्यवाणी कर सकती है, किस हद तक योग्यता विरासत में मिली है, और योग्यता के क्या निहितार्थ हैं शैक्षिक सिद्धांतों पर है। 

यह खुफिया और आईक्यू से निकटता से संबंधित एक मुद्दा है , और कार्ल सीहोर के काम से अग्रणी था । जबकि योग्यता के शुरुआती परीक्षण, जैसे कि सीहोर की द मेजरमेंट ऑफ म्यूजिकल टैलेंट , ने पिच, अंतराल, लय, व्यंजन, स्मृति, आदि के भेदभाव परीक्षणों के माध्यम से जन्मजात संगीत प्रतिभा को मापने की मांग की, बाद में शोध में इन दृष्टिकोणों को थोड़ा भविष्य कहनेवाला शक्ति और परीक्षार्थी की मनोदशा, प्रेरणा, आत्मविश्वास, थकान और परीक्षा देते समय ऊब से अत्यधिक प्रभावित हों। 
संगीत मनोविज्ञान पत्रिकाओं में शामिल हैं:

संगीत धारणा
संगीत वैज्ञानिक
संगीत का मनोविज्ञान
संगीत और विज्ञान
जहरबच म्यूसिकसाइकोलॉजी 
संगीत मनोवैज्ञानिक मुख्यधारा के संगीत विज्ञान, कम्प्यूटेशनल संगीतशास्त्र , संगीत सिद्धांत / विश्लेषण, मनोविज्ञान, संगीत शिक्षा, संगीत चिकित्सा, संगीत चिकित्सा, और व्यवस्थित संगीत विज्ञान पत्रिकाओं की एक विस्तृत श्रृंखला में भी प्रकाशित करते हैं। उत्तरार्द्ध में उदाहरण के लिए शामिल हैं:

कंप्यूटर संगीत जर्नल
अनुभवजन्य संगीतशास्त्र समीक्षा
मनोविज्ञान में फ्रंटियर्स
जर्नल ऑफ़ न्यू म्यूज़िक रिसर्च
गणित और संगीत की पत्रिका 
अमेरिका की एकॉस्टिकल सोसायटी का जर्नल
संगीत शिक्षा में अनुसंधान अध्ययन

संगीत शिक्षा
संगीत मनोविज्ञान अनुसंधान का एक प्राथमिक फोकस इस बात से संबंधित है कि संगीत को कैसे पढ़ाया जाए और इसका बचपन के विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है।
समेत:

संगीत शिक्षा का अनुकूलन
जीवन भर संगीत व्यवहार और क्षमताओं का विकास
एक संगीत वाद्ययंत्र या गायन सीखने में शामिल विशिष्ट कौशल और प्रक्रियाएं
एक संगीत विद्यालय के भीतर गतिविधियाँ और अभ्यास
एक संगीत वाद्ययंत्र का व्यक्तिगत बनाम समूह सीखना
बुद्धि पर संगीत शिक्षा का प्रभाव
अनुकूलन अभ्यास
संगीत और उत्पादकता
कई अध्ययनों ने माना है कि काम करते समय संगीत सुनना जटिल संज्ञानात्मक कार्य करने वाले लोगों की उत्पादकता को प्रभावित करता है।  एक अध्ययन ने सुझाव दिया कि संगीत की अपनी पसंदीदा शैली को सुनने से कार्यस्थल में उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है,  हालांकि अन्य शोधों में पाया गया है कि काम करते समय संगीत सुनना व्याकुलता का एक स्रोत हो सकता है , जिसमें जोर से और गीतात्मक सामग्री संभवतः एक भूमिका।  संगीत सुनने और उत्पादकता के बीच संबंधों को प्रभावित करने के लिए प्रस्तावित अन्य कारकों में संगीत संरचना, कार्य जटिलता और संगीत की पसंद और उपयोग पर नियंत्रण की डिग्री शामिल है।
संगीत मनोविज्ञान , या संगीत के मनोविज्ञान , दोनों की एक शाखा के रूप में माना जा सकता है मनोविज्ञान और विद्या । इसका उद्देश्य संगीत व्यवहार और अनुभव को समझाना और समझना है , जिसमें उन प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है जिनके माध्यम से संगीत को माना जाता है, बनाया जाता है, प्रतिक्रिया दी जाती है और रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल किया जाता है।  आधुनिक संगीत मनोविज्ञान मुख्य रूप से अनुभवजन्य है ; इसका ज्ञान मानव प्रतिभागियों के व्यवस्थित अवलोकन और उनके साथ बातचीत द्वारा एकत्र किए गए डेटा की व्याख्या के आधार पर आगे बढ़ता है. संगीत मनोविज्ञान कई क्षेत्रों के लिए व्यावहारिक प्रासंगिकता के साथ अनुसंधान का एक क्षेत्र है, जिसमें संगीत प्रदर्शन , रचना , शिक्षा , आलोचना और चिकित्सा , साथ ही मानव दृष्टिकोण , कौशल , प्रदर्शन , बुद्धि , रचनात्मकता और सामाजिक व्यवहार की जांच शामिल है ।

संगीत मनोविज्ञान संगीतशास्त्र और संगीत अभ्यास के गैर-मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डाल सकता है । उदाहरण के लिए, यह मेलोडी , सद्भाव , टोनलिटी , रिदम , मीटर और फॉर्म जैसे संगीत संरचनाओं की धारणा और कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग की जांच के माध्यम से संगीत सिद्धांत में योगदान देता है । संगीत इतिहास में अनुसंधान संगीतमय वाक्य रचना के इतिहास के व्यवस्थित अध्ययन से या उनके संगीत के प्रति अवधारणात्मक, भावात्मक और सामाजिक प्रतिक्रियाओं के संबंध में संगीतकारों और रचनाओं के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से लाभ उठा सकता है ।
प्रारंभिक इतिहास (पूर्व-1850)
19 वीं शताब्दी से पहले ध्वनि और संगीत की घटना का अध्ययन मुख्य रूप से पिच और टोन के गणितीय मॉडलिंग पर केंद्रित था ।  सबसे पहले दर्ज किए गए प्रयोग ६ वीं शताब्दी ईसा पूर्व से हैं, विशेष रूप से पाइथागोरस के काम में और उनके द्वारा सप्तक के व्यंजन बनाने वाले सरल स्ट्रिंग लंबाई अनुपात की स्थापना । यह विचार कि ध्वनि और संगीत को विशुद्ध रूप से भौतिक दृष्टिकोण से समझा जा सकता है, एनाक्सगोरस और बोथियस जैसे सिद्धांतकारों द्वारा प्रतिध्वनित किया गया था । एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक असंतुष्ट अरिस्टोक्सेनस थे , जिन्होंने अपने विचार में आधुनिक संगीत मनोविज्ञान का पूर्वाभास किया कि संगीत को केवल मानवीय धारणा और मानव स्मृति से इसके संबंध के माध्यम से समझा जा सकता है। उनके विचारों के बावजूद, मध्य युग और पुनर्जागरण के माध्यम से अधिकांश संगीत शिक्षा पाइथागोरस परंपरा में निहित रही, विशेष रूप से खगोल विज्ञान , ज्यामिति , अंकगणित और संगीत के चतुर्भुज के माध्यम से । 

विन्सेन्ज़ो गैलीली ( गैलीलियो के पिता ) द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि, जब स्ट्रिंग की लंबाई स्थिर रखी जाती है, तो इसके तनाव, मोटाई या संरचना को बदलने से कथित पिच बदल सकती है। इससे उन्होंने तर्क दिया कि संगीत की घटना के लिए सरल अनुपात पर्याप्त नहीं थे और एक अवधारणात्मक दृष्टिकोण आवश्यक था। उन्होंने यह भी दावा किया कि विभिन्न ट्यूनिंग सिस्टम के बीच अंतर समझ में नहीं आता, इस प्रकार विवाद अनावश्यक थे। गैलीलियो , केप्लर , मेर्सन और डेसकार्टेस द्वारा काम सहित वैज्ञानिक क्रांति के माध्यम से कंपन , व्यंजन , हार्मोनिक श्रृंखला और अनुनाद सहित विषयों का अध्ययन आगे बढ़ाया गया । इसमें विशेष रूप से सावर्ट , हेल्महोल्ट्ज़ और कोएनिग द्वारा इंद्रियों की प्रकृति और उच्च-क्रम प्रक्रियाओं के बारे में और अटकलें शामिल थीं
संगीत को अपने श्रोताओं में लगातार भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने के लिए दिखाया गया है, और मानव प्रभाव और संगीत के बीच इस संबंध का गहराई से अध्ययन किया गया है।  इसमें यह अलग करना शामिल है कि एक संगीत कार्य या प्रदर्शन की कौन सी विशिष्ट विशेषताएं कुछ प्रतिक्रियाओं को व्यक्त या प्राप्त करती हैं, प्रतिक्रियाओं की प्रकृति स्वयं, और श्रोता की विशेषताएं कैसे निर्धारित कर सकती हैं कि कौन सी भावनाएं महसूस की जाती हैं। यह क्षेत्र दर्शन , संगीतशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र के साथ-साथ संगीत रचना और प्रदर्शन जैसे क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है । आकस्मिक श्रोताओं के लिए निहितार्थ भी महान हैं; शोध से पता चला है कि भावनात्मक संगीत से जुड़ी सुखद भावनाएं स्ट्रिएटम में डोपामाइन रिलीज का परिणाम हैं - वही शारीरिक क्षेत्र जो नशीली दवाओं की लत के अग्रिम और पुरस्कृत पहलुओं को रेखांकित करते हैं ।  शोध के अनुसार, संगीत सुनना व्यक्ति के मूड को प्रभावित करता पाया गया है। मुख्य कारक जो उस व्यक्ति को सकारात्मक या नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा, वह संगीत की गति और शैली पर आधारित है। इसके अलावा, संगीत सुनने से संज्ञानात्मक कार्य, रचनात्मकता भी बढ़ती है और थकान की भावना कम होती है। इन सभी कारकों से बेहतर वर्कफ़्लो और संगीत सुनते समय की जाने वाली गतिविधि में अधिक इष्टतम परिणाम प्राप्त होते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि गतिविधि करते समय संगीत सुनना उत्पादकता और समग्र अनुभव को बढ़ाने का एक उत्कृष्ट तरीका है।
संगीत प्रशिक्षण के तंत्रिका संबंधी संबंध
यद्यपि औपचारिक संगीत प्रशिक्षण के बिना लोगों में श्रवण-मोटर बातचीत देखी जा सकती है, संगीतकार श्रवण और मोटर प्रणालियों के बीच लंबे समय से स्थापित और समृद्ध संघों के कारण अध्ययन करने के लिए एक उत्कृष्ट आबादी हैं। संगीतकारों को शारीरिक अनुकूलन दिखाया गया है जो उनके प्रशिक्षण से संबंधित हैं।  कुछ न्यूरोइमेजिंग अध्ययनों में पाया गया है कि साधारण मोटर कार्यों के प्रदर्शन के दौरान संगीतकार गैर-संगीतकारों की तुलना में मोटर क्षेत्रों में निम्न स्तर की गतिविधि दिखाते हैं, जो तंत्रिका भर्ती के अधिक कुशल पैटर्न का सुझाव दे सकता है। 
संज्ञानात्मक संगीतशास्त्र
संज्ञानात्मक संगीतशास्त्र, संगीत और अनुभूति दोनों को समझने के लक्ष्य के साथ कम्प्यूटेशनल रूप से मॉडलिंग संगीत ज्ञान से संबंधित संज्ञानात्मक विज्ञान की एक शाखा है । 

संज्ञानात्मक संगीतशास्त्र को संगीत अनुभूति और संगीत के संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र से पद्धतिगत जोर में अंतर से अलग किया जा सकता है । संज्ञानात्मक संगीतशास्त्र संगीत से संबंधित ज्ञान प्रतिनिधित्व का अध्ययन करने के लिए कंप्यूटर मॉडलिंग का उपयोग करता है और इसकी जड़ें कृत्रिम बुद्धि और संज्ञानात्मक विज्ञान में हैं । कंप्यूटर मॉडल का उपयोग एक सटीक, संवादात्मक माध्यम प्रदान करता है जिसमें सिद्धांतों को तैयार और परीक्षण किया जाता है। 
यह अंतःविषय क्षेत्र मस्तिष्क में भाषा और संगीत के बीच समानता जैसे विषयों की जांच करता है। गणना के जैविक रूप से प्रेरित मॉडल अक्सर अनुसंधान में शामिल होते हैं, जैसे तंत्रिका नेटवर्क और विकासवादी कार्यक्रम।  यह क्षेत्र यह मॉडल करना चाहता है कि कैसे संगीत ज्ञान का प्रतिनिधित्व, संग्रहीत, माना, प्रदर्शन और उत्पन्न किया जाता है। एक अच्छी तरह से संरचित कंप्यूटर वातावरण का उपयोग करके, इन संज्ञानात्मक घटनाओं की व्यवस्थित संरचनाओं की जांच की जा सकती है।


संगीत मनुष्य की आरम्भिक अवस्था से जुड़ा हुआ है। प्रकृति में होने वाली समस्त क्रियाओं व बदलावों ने मानव को आश्चर्य चकित किया। मस्तिष्क ने अपनी स्वाभाविक जैविक क्रिया की और मनुष्य अनजाने में ही जिज्ञासा के मोहपाश में फंसता चला गया (मस्तिष्क मनन) का कार्य ही सोच व शंका को जन्म देता है और यही सोच व शंका प्रगति व परिवर्तन की आधारभूत भूमि है।


    ब्रह्मण्ड में उपस्थित समस्त ध्वनियों ने मनुष्य को अलग-अलग वातावरण व प्रतिक्रियाओं में बांटा। हर ध्वनि पर उसकी प्रतिक्रिया उसके भीतर एक अलग भाव व उत्तेजना को जन्म देती है। यहाँ भी उसे संगीत द्वारा अपने मनोविज्ञान पर होने वाले प्रभाव का पता नहीं था। किन्तु यह क्रिया स्वाभाविक व प्राकृतिक थी। इन्हीं अलग-अलग भावों ने अलग-अलग ध्वनियों की (अमूर्त) श्रेणी व उनकी (मूर्त) पहचान बनाई जो बाद में एक निरंतर खोज व जिज्ञासा के कारण स्वर, राग व संगीत के शुद्ध रूप में सामने आई। संगीत शास्त्रों में स्वरों का जीव-जन्तुओं की बोलियों से सम्बन्ध इसी बात का प्रमाण है।